सरकारी नहर पर अवैध कब्जा: जल संसाधन विभाग की अनदेखी से भड़के किसान और वार्डवासी
बालोद। बालोद जिला मुख्यालय के 930 नेशनल हाईवे दल्ली रोड स्थित गोंदली नहर पर एक कॉम्प्लेक्स संचालक द्वारा अवैध रूप से पक्की पुलिया का निर्माण कर लिया गया है। यह निर्माण न केवल जल संसाधन विभाग की नियमावली के खिलाफ है, बल्कि क्षेत्र के किसानों और स्थानीय वार्डवासियों के लिए भी मुसीबत बन गया है।
27 मई को जल संसाधन विभाग ने इस अवैध निर्माण पर संज्ञान लेते हुए कॉम्प्लेक्स संचालक को नोटिस जारी किया था, जिसमें तीन दिवस के भीतर नहर से अवैध पुलिया हटाने के निर्देश दिए गए थे। बावजूद इसके, 10 दिन बीत जाने के बाद भी संचालक ने विभागीय आदेशों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है।
खानापूर्ति तक सीमित विभाग, नहीं हुई कोई कार्रवाई
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जल संसाधन विभाग ने महज़ औपचारिकता निभाते हुए नोटिस जारी किया और अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। इससे अवैध निर्माण को मौन समर्थन मिलने का संदेश जा रहा है। विभाग की यह निष्क्रियता क्षेत्र में अन्य अवैध निर्माणों को भी बढ़ावा दे सकती है।
विभाग ने भी माना अवैध निर्माण
जल संसाधन विभाग द्वारा जारी नोटिस में साफ लिखा गया है कि बालोद माइनर की शासकीय जमीन पर कॉम्प्लेक्स संचालक ने नहर को पाटकर तीन नग 17.17 फीट लंबे और 5.10 मीटर चौड़े सीमेंट पाइप डालकर पक्की पुलिया बना ली है। विभागीय निरीक्षण में इस निर्माण को नियमविरुद्ध पाया गया।
नहर के अस्तित्व पर खतरा, किसान और वार्डवासी नाराज़
यह नहर न केवल किसानों की फसलों की सिंचाई का प्रमुख स्रोत है, बल्कि शहर के कई वार्डों में निस्तारी के पानी की आपूर्ति भी इसी से होती है। ऐसे में नहर पर अवैध पुलिया के निर्माण से पानी की निर्बाध आपूर्ति बाधित होने की आशंका है।
स्थानीय वार्डवासियों का कहना है कि पक्की पुलिया के चलते नहर की जलधार कमजोर हो गई है। बरसात में यदि पानी का प्रवाह तेज़ हुआ तो वह पुलिया के ऊपर से सड़क पर बह सकता है, जिससे जलजमाव और दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाएगा।
स्थानीयों की मांग: हो सख्त कार्रवाई
किसानों और वार्डवासियों ने प्रशासन से मांग की है कि अवैध पुलिया को तत्काल हटाया जाए और जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। लोगों का कहना है कि यदि विभाग जल्द सख्ती नहीं दिखाता, तो यह नहर एक दिन सिर्फ कागज़ों पर ही रह जाएगी।
सरकारी नहर पर हुए इस खुलेआम अतिक्रमण और विभागीय ढिलाई ने एक बार फिर प्रशासनिक सुस्ती और स्थानीय हितों की अनदेखी को उजागर कर दिया है। अब देखना यह होगा कि जल संसाधन विभाग कब अपनी नींद से जागता है और क्या वाकई किसी ठोस कार्रवाई को अंजाम दिया जाता है या यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।




















