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पहले एनएच 930, अब दल्ली चौक… बालोद में दोहराया जा रहा है विरोध का इतिहास…निर्माण से पहले ही सड़क पर खड़ी हो गई राजनीतिक और सामाजिक दीवार

बालोद में डिवाइडर निर्माण को लेकर टकराव: विकास बनाम जनसुविधा का द्वंद्व

बालोद। बालोद जिला मुख्यालय में दल्ली चौक से रेलवे फाटक तक 1.85 किलोमीटर लंबे सड़क मार्ग पर प्रस्तावित डिवाइडर को लेकर शहर में दो राय बन गई है। एक तरफ जिला प्रशासन सड़क सुरक्षा और सौंदर्यीकरण के उद्देश्य से लगभग 8 करोड़ की लागत से इस कार्य को शुरू करने जा रहा है, तो दूसरी ओर स्थानीय व्यापारी और रहवासी इस प्रस्ताव का जोरदार विरोध कर रहे हैं।

डिवाइडर से बढ़ेगी शहर की गरिमा: प्रशासन और नागरिकों का एक वर्ग

प्रशासन और कई नागरिकों का मानना है कि बालोद, भले ही जिला मुख्यालय है, लेकिन वर्तमान स्वरूप में इसका आभास नहीं होता। डिवाइडर बनने से सड़क व्यवस्थित होगी, ट्रैफिक नियंत्रण में रहेगा और दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी। भाजपा नेता विनोद जैन ने सोशल मीडिया पोस्ट में स्पष्ट रूप से कहा: “दल्लीराजहरा तिराहा से रेलवे फाटक तक सौंदर्यीकरण जरूरी है। सीमांकन करके डिवाइडर, स्ट्रीट लाइट और अतिक्रमण हटाने की आवश्यकता है। विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि कुछ लोगों का कब्जा हटेगा। जिला मुख्यालय की सड़क, मुख्यालय जैसी दिखनी चाहिए।”

 

वरिष्ठ अधिवक्ता आदिल सिद्धिकी,आफताब आलम सहित अन्य कुछ लोगो ने भी सोसल मीडिया पोस्ट के माध्यम से डिवाइडर का समर्थन करते हुए कहा: “यह जनहित का मामला है। ऐसे कार्य भविष्य को ध्यान में रखकर किए जाते हैं। केवल चार लोगों के विरोध से कोई काम रुकना नहीं चाहिए। शहर को व्यवस्थित होना ही चाहिए।”

विरोध का स्वर: डिवाइडर से होगी जनसुविधाओं में बाधा

वहीं, दल्ली चौक से रेलवे फाटक तक के मार्ग पर रहने वाले व्यापारी और नागरिकों का कहना है कि यह मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग नहीं, बल्कि शहर के अंदर का मुख्य आवागमन मार्ग है। यह रास्ता स्कूलों, बैंकों, अस्पतालों, शासकीय कार्यालयों, दुकानों और धार्मिक स्थलों से जुड़ा है। यहां शोभा यात्राएं, जुलूस भी निकलते हैं। डिवाइडर बनने से ट्रैफिक जाम, पैदल आवाजाही में दिक्कत, दुकानदारी पर असर और दुर्घटनाओं की आशंका जताई जा रही है।

पर्यावरणीय चिंता और व्यापार पर असर

प्रदर्शनकारियों का दावा है कि सड़क किनारे कई पुराने पेड़ मौजूद हैं जो डिवाइडर निर्माण से कट सकते हैं, जिससे शहर का पर्यावरण संतुलन बिगड़ सकता है। साथ ही, कई छोटे दुकानदारों की आजीविका भी प्रभावित होगी।ज्ञापन में शामिल रहे स्थानीय लोगों में सोहनलाल टावरी, दीपक चोपड़ा, विष्णु दुबे, श्याम टावरी, संतोष राव, आदिल अशरफी सहित दर्जनों व्यापारियों और रहवासियों ने डिवाइडर निर्माण पर पुनर्विचार की मांग की है।

एनएच-930 का उदाहरण: डिवाइडर हटाने के बाद भी नहीं रुकी दुर्घटनाएं

गौरतलब है कि इससे पहले एनएच 930 के निर्माण के दौरान भी डिवाइडर का विरोध हुआ था। तब क्रैश बैरियर लगाया गया, जिसे दुर्घटनाओं के चलते बाद में हटाना पड़ा। इसके बावजूद दुर्घटनाएं नहीं रुकीं और अब गंजपारा क्षेत्र में फिर डिवाइडर की मांग उठ रही है।

अब क्या करेगा प्रशासन?

प्रशासन के पास अब दो रास्ते हैं:

1. डिवाइडर निर्माण के पक्ष में खड़ा रहकर शहर के दीर्घकालिक हित में काम करना।
2. या स्थानीय विरोध को ध्यान में रखते हुए प्रस्ताव में संशोधन करना।

यह एक नीति बनाम जनभावना की लड़ाई बन गई है, जिसमें दोनों पक्षों के तर्क वाजिब प्रतीत होते हैं।

बालोद शहर की पहचान और सड़क सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण है। अब देखना होगा कि क्या जिला प्रशासन नागरिकों की मांग पर डिवाइडर योजना में बदलाव करता है, या दीर्घकालिक हित को प्राथमिकता देकर निर्माण कार्य आरंभ करता है।

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