मैनपुर, छत्तीसगढ़ | विशेष रिपोर्ट
यह कोई फिल्मी कहानी नहीं, बल्कि एक हकीकत है छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर ब्लॉक की — जहां आज भी बीमारी का मतलब सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच की दौड़ होती है।
ग्राम पंचायत कुल्हाड़ी घाट के आश्रित गांव भालू डिग्गी में रहने वाले 30 वर्षीय गोपी राम नेताम को बीती रात एक ज़हरीले सांप ने काट लिया। मामला बेहद गंभीर था — सांप के डसते ही वह बेहोश हो गया। लेकिन जब जीवन की आस बाकी हो, तो हिम्मत रास्ता बन ही लेती है। परिवार ने तत्काल लकड़ी और कपड़ों से एक डोला तैयार किया, और पहाड़ों व जंगलों से होते हुए 9 किलोमीटर दूर कुल्हाड़ी घाट तक उसे कंधों पर उठाकर ले गए।
अंधेरे जंगल, वीरान रास्ते, और डरावनी खामोशी के बीच सिर्फ एक ही चीज़ साथ थी — उम्मीद।
मैनपुर अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने बताया कि यदि थोड़ी भी देर हो जाती, तो गोपी राम की जान नहीं बचती। समय रहते इलाज मिलने से उसकी जान बच सकी।
सवाल सिर्फ एक जान का नहीं
यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों-हज़ारों ग्रामीणों की कहानी है, जो आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से कोसों दूर हैं। मोबाइल नेटवर्क, एम्बुलेंस, या प्राथमिक चिकित्सा — इनका दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं है।
गोपी राम के पिता दशरथ नेताम कहते हैं, “यहां सांप, बिच्छू, भालू — सब आम बात है। लेकिन जब किसी को काट ले, तो इलाज के नाम पर कुछ नहीं होता। या तो डोला बनाओ, या भगवान के भरोसे छोड़ दो।”
वन विभाग ने संवेदनशीलता दिखाते हुए पीड़ित परिवार को 1000 रुपये की आर्थिक मदद दी है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इतनी राशि से दुर्गम इलाकों की दशा बदलेगी?
ग्रामीणों की गुहार
स्थानीय ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि:
ऐसे इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोले जाएं।
सर्पदंश जैसी आपात स्थिति से निपटने के लिए एम्बुलेंस सेवा उपलब्ध कराई जाए।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
जंगलों में जीना इनकी मजबूरी है, लेकिन इलाज तो इनका अधिकार है।




















