रायपुर, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की असमान तैनाती को लेकर शुरू की गई युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया अब विवाद का रूप ले चुकी है। शिक्षा विभाग इसे आवश्यक प्रशासनिक सुधार बता रहा है, जबकि शिक्षक संघों ने इसे तानाशाहीपूर्ण, अवैज्ञानिक और अपमानजनक बताते हुए विरोध का बिगुल फूंक दिया है।
क्या है युक्तियुक्तकरण और क्यों हो रहा है विरोध?
वर्तमान में प्रदेश के हजारों सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या में असंतुलन है। कई स्कूलों में शिक्षक अधिक हैं, जबकि अनेक स्कूलों में एक भी शिक्षक नहीं है।
आंकड़े बताते हैं:
212 प्राथमिक और 48 पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में एक भी शिक्षक पदस्थ नहीं है।
6,872 प्राथमिक और 255 पूर्व माध्यमिक स्कूल एकल शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।
कुछ स्कूलों में छात्रों की संख्या 50 से कम है लेकिन 5 या अधिक शिक्षक पदस्थ हैं।
इन्हीं असंतुलनों को दूर करने के उद्देश्य से शिक्षा विभाग ने शिक्षकों को अधिशेष घोषित कर युक्तियुक्तकरण के तहत अन्य विद्यालयों में पदस्थ करने की प्रक्रिया शुरू की है।
शिक्षक संघों का तीव्र विरोध
प्रदेशभर के शिक्षक संघों ने इस कदम का तीव्र विरोध करते हुए इसे शिक्षकों की गरिमा पर आघात बताया है।
वीरेंद्र दुबे, प्रदेश अध्यक्ष, शालेय शिक्षक संघ (अधिकार मंच): ने मामले पर कहा कि प्राथमिक शाला में 5 कक्षा तक 2 शिक्षक कैसे पढ़ाएंगे और कितनी गुणवत्ता दे पाएंगे उन्होंने कहा “यह निर्णय आरटीई एक्ट 2009, सेटअप 2008 और सेवा नियम 2019 का खुला उल्लंघन है। विभागीय अधिकारी शिक्षकों से संवाद किए बिना निर्णय ले रहे हैं, जो शिक्षकों के मनोबल को तोड़ रहा है।”
जितेंद्र शर्मा, अध्यक्ष, शालेय शिक्षक संघ:
> “शिक्षकों को अधिशेष घोषित करते समय न तो सेवा नियमों का पालन किया गया, न ही विद्यालय की वास्तविक आवश्यकता को देखा गया। महिला शिक्षकों, वरिष्ठ कर्मियों, विशेष योग्यता प्राप्त शिक्षकों को भी मनमाने ढंग से दूरस्थ स्थानों में भेजा जा रहा है। यह प्रक्रिया पूरी तरह तानाशाहीपूर्ण है। हमने मांग की है कि इस पूरी नीति को तत्काल रोका जाए और शिक्षक संघों को विश्वास में लेकर नई प्रक्रिया तैयार की जाए। यदि हमारी बातें नहीं मानी गईं, तो जल्द ही प्रदेशव्यापी आंदोलन पर भी विचार कर सकती है।”
सरिता वर्मा, महासचिव, महिला शिक्षक संघ:
> “हमारी महिला शिक्षिकाओं को 100-150 किलोमीटर दूर स्थानांतरित किया गया है, वो भी बिना पूर्व सूचना के। यह न केवल सेवा शर्तों का उल्लंघन है, बल्कि यह मानसिक उत्पीड़न जैसा है।”
नवीन बघेल, महासचिव, प्राथमिक शिक्षक संघ:
> “शिक्षकों का युक्तियुक्तकरण जरूरी हो सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत होनी चाहिए। अभी जो किया जा रहा है वह जबरदस्ती और अवैज्ञानिक आधार पर हो रहा है।”
शिक्षक संघों की प्रमुख आपत्तियाँ
1. अधिशेष शिक्षक की परिभाषा अस्पष्ट – शिक्षक किस आधार पर अधिशेष घोषित किए गए, इसकी कोई स्पष्ट गाइडलाइन नहीं है।
2. सेवा नियमों की अवहेलना – वर्षों से कार्यरत शिक्षकों की वरिष्ठता, शैक्षणिक योग्यता और पारिवारिक स्थिति की अनदेखी।
3. स्थानांतरण में पक्षपात के आरोप – कुछ शिक्षकों को मनपसंद स्थान दिए गए जबकि योग्य शिक्षक दूरस्थ स्थानों पर भेजे गए।
4. महिला शिक्षकों को विशेष छूट न देना – महिलाओं की पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों की कोई परवाह नहीं की गई।
5. शिक्षक संघों को नजरअंदाज किया गया – पूरी प्रक्रिया शिक्षक संगठनों की राय लिए बिना की जा रही है।
सरकार की सफाई: ‘छात्रों के हित में लिया गया निर्णय‘
शिक्षा विभाग का कहना है कि यह कदम विद्यार्थियों के हित में उठाया गया है ताकि सभी विद्यालयों में समान रूप से शिक्षक उपलब्ध हों।
शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा:
> “हमारा उद्देश्य किसी शिक्षक को प्रताड़ित करना नहीं है, बल्कि पूरे राज्य में शिक्षक संसाधनों का संतुलित उपयोग करना है। किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। जो शिक्षक असंतुष्ट हैं, वे अपील कर सकते हैं।”
राजनीतिक प्रतिक्रिया और आंदोलन की घोषणा
विपक्षी दलों ने सरकार के निर्णय को शिक्षकों के सम्मान पर कुठाराघात बताया है। पूर्व शिक्षा मंत्री ने कहा:
> “शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के नाम पर शिक्षकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करना पूरी तरह अनुचित है।”
सुधार बनाम संवादहीनता
युक्तियुक्तकरण एक आवश्यक सुधार प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन इसकी सफलता संवाद, पारदर्शिता और सहभागिता पर निर्भर है। वर्तमान रूप में यह कदम शिक्षकों में असंतोष और असुरक्षा की भावना फैला रहा है, जो शिक्षा के स्तर पर भी असर डाल सकता है।
अब जरूरत इस बात की है कि शासन और शिक्षक संगठन संवाद की पहल करें, ताकि छात्र हित भी सुरक्षित रहे और शिक्षकों की गरिमा भी अक्षुण्ण बनी रहे।
आपकी राय महत्वपूर्ण है!
क्या आप छत्तीसगढ़ में शिक्षकों के साथ हो रहे इस युक्तियुक्तकरण के निर्णय से सहमत हैं? क्या आपको लगता है कि यह नीति शिक्षक हितों को नुकसान पहुँचा रही है या शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने का प्रयास है?
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