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‘मैं’ की भावना परिवारों को कर रही बिखरने पर मजबूर : अक्षयमुनिजी

बालोद। समता भवन में चल रही चातुर्मास श्रृंखला के दौरान शासन दीपक श्री अक्षयमुनिजी मसा ने कहा कि शरीर को खुराक, मन को सकारात्मक विचार और आत्मा को जागरण की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन काफी हद तक उसके विचारों पर निर्भर है। नकारात्मक विचार व्यक्ति के जीवन में समस्याएं बढ़ाते हैं। किसी का अपमान कर हम अपना ही सम्मान खोते हैं और कर्मों का बंधन बढ़ाते हैं।

जैन संत ने कहा कि स्वयं की पहचान किए बिना दूसरों को समझना संभव नहीं है। आज व्यक्ति भौतिक आवश्यकताओं और तृष्णा के बीच अंतर नहीं कर पा रहा है। महात्मा गांधी के विचार का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है, लेकिन तृष्णा की नहीं। उन्होंने मोबाइल के सदुपयोग, समय के साथ स्वयं में परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और मर्यादित जीवन पर जोर दिया।

अक्षयमुनिजी ने कहा कि कर्मों का परिणाम समय आने पर सामने आता है। व्यक्ति को अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करना चाहिए। आज परिवारों में बढ़ती ‘मैं’ की भावना के कारण रिश्तों में दूरी बढ़ रही है। पहले सामूहिक परिवारों में लोग सुख-दुख में एक-दूसरे के काम आते थे। उन्होंने प्रेम, संयम, जागरूकता और पारिवारिक मर्यादा को जीवन का आधार बताया।

उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की वाणी दीपक की तरह जीवन को मार्गदर्शन देती है। ऊंचाइयों को छूने के साथ व्यक्ति को धरातल और अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए। इस दौरान तपस्या क्रम में ममता नाहटा ने 4 एवं यश बुरड़ ने 3 उपवास का संकल्प ग्रहण किया।

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