जिलाध्यक्ष पद के लिए चार दावेदार मैदान में थे, जिनमें बालोद ब्लॉक से लता कोर्राम, गुरुर ब्लॉक से छगन सिन्हा, डौंडीलोहारा ब्लॉक से सेवंत नेताम तथा गुंडरदेही ब्लॉक से क्रांतिभूषण साहू ने अपनी दावेदारी पेश की थी। चुनाव से पहले सरपंचों द्वारा गठित समन्वय समिति में चर्चा के दौरान लता कोर्राम और छगन सिन्हा ने क्रांतिभूषण साहू के समर्थन में अपना नाम वापस ले लिया, जबकि सेवंत नेताम ने चुनाव कराने की मांग पर कायम रहे।

इसके बाद कोर कमेटी ने उपस्थित सरपंचों से चुनाव या समन्वय पर राय ली, जिसमें बहुमत ने समन्वय का समर्थन किया। जिले के पांचों ब्लॉकों से 6-6 सदस्यों को मिलाकर बनी 30 सदस्यीय कोर कमेटी द्वारा मतदान कराया गया। मतदान में क्रांतिभूषण साहू को 23 वोट और सेवंत नेताम को 7 वोट मिले। इस प्रकार बहुमत के आधार पर क्रांतिभूषण साहू को सरपंच संघ का जिलाध्यक्ष निर्वाचित घोषित किया गया।
भाजपा बहुलता के बावजूद बदला समीकरण
गौरतलब है कि पिछले वर्ष हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जिले के अधिकांश जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य तथा बड़ी संख्या में पंच-सरपंच भाजपा समर्थित निर्वाचित हुए थे। इसके चलते सरपंच संघ के ब्लॉक स्तरीय चुनावों में भी भाजपा समर्थित सरपंच ब्लॉक अध्यक्ष चुने गए थे। ऐसे में माना जा रहा था कि जिलाध्यक्ष पद पर भी भाजपा समर्थित उम्मीदवार की जीत तय है, लेकिन आपसी सामंजस्य की कमी के कारण भाजपा रणनीतिक बढ़त को परिणाम में नहीं बदल सकी।

“पंच से पार्लियामेंट” के दावे पर सवाल
पंचायत चुनाव में ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा नेताओं द्वारा “पंच से पार्लियामेंट” तक पार्टी का परचम लहराने का दावा किया गया था, लेकिन सरपंच संघ के इस चुनाव परिणाम ने इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर गुटबाजी और समन्वय की कमी का लाभ कांग्रेस समर्थित सरपंच को मिला, जिससे संगठनात्मक चुनाव में कांग्रेस को बढ़त हासिल हुई।




















