बालोद। दीपों के पर्व दीपावली के साथ ही बालोद जिले में पारंपरिक और सांस्कृतिक आस्था का संगम गौरा-गौरी पर्व भी पूरे उत्साह के साथ मनाया गया। चार दिनों तक चली विवाह रस्मों के बाद मंगलवार-बुधवार को श्रद्धालुओं ने पूरे विधि-विधान से गौरा-गौरी की पूजा अर्चना कर प्रतिमाओं का विसर्जन किया। ग्रामीण और शहरी दोनों ही इलाकों में ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक गड़वा बाजा की धुन पर गौरा-गौरी गीत गूंजते रहे।
लक्ष्मी पूजा के साथ हुई गौरा-गौरी की स्थापना
दीपावली की रात लक्ष्मी पूजा के बाद गांवों में कुंवारी लड़कियों ने सिर पर कलश रखकर मोहल्लों और गलियों का भ्रमण किया। मिट्टी से गौरा-गौरी (शिव-पार्वती) की प्रतिमाएँ बनाई गईं, जिन्हें “दूधफरा” (दूध में उबाले चावल के आटे से बना प्रसाद) का भोग लगाया गया। यही पकवान अगले दिन पूरे गांव में प्रसाद रूप में वितरित किया गया।
गांव के तालाब से लाई गई “कुवांरी मिट्टी” से मूर्तियाँ बनाने के बाद गौरा की ओर से गौवरी के घर बारात लेकर जाने की परंपरा निभाई गई। शादी की सारी रस्में दीपावली की रात पूरी की गईं और प्रतिमाएँ “गौरा चौरा” में विराजित की गईं। इसके बाद गोवर्धन पूजा के दिन सुबह गाजे-बाजे के साथ तालाब में विसर्जन किया गया।

शहर से लेकर गांवों तक दिखी पर्व की धूम
मरारपारा, पांडेपारा, नयापारा, कुंदरूपारा, संजयनगर, शिकारीपारा सहित मेड़की, बघमरा, ओरमा, खरथुली, भोथली, जगन्नाथपुर और सांकरा गांवों में गौरा-गौरी की कलश यात्रा निकाली गई। कुंवारी लड़कियाँ सिर पर कलश लिए पारंपरिक वेशभूषा में आकर्षण का केंद्र बनीं। आदिवासी समाज की महिलाओं ने गौरा-गौरी गीतों से वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
यह पर्व विशेष रूप से बैगा और गोंड जनजातियों में महत्वपूर्ण माना जाता है, जो पीढ़ियों से इसे प्रकृति और वैवाहिक पवित्रता के प्रतीक के रूप में मनाते आ रहे हैं।
गोवर्धन पूजा में उमड़ेंगे श्रद्धालु
दीपावली के तीसरे दिन बुधवार को दोपहर में गोवर्धन पूजा का भी उत्सव उमंग और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। रावत और ठेठवार समाज के लोग पारंपरिक डांग डोरी लेकर गली-गली नाचते-गाते निकले। गौठान स्थित साहड़ा देव में गोवर्धन पर्वत और गाय-बछड़े की पूजा की जाएगी।
इस दौरान बछड़े को गोबर के ऊपर चलाने की प्रथा निभाई जाएगी, जिसके बाद लोग एक-दूसरे को गोबर का तिलक लगाकर शुभकामनाएं देंगे।

गोवर्धन पूजा का संदेश
पौराणिक मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर ब्रजवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया और संदेश दिया कि मनुष्य को गौ धन और पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। यही कारण है कि आज भी इस दिन गायों की पूजा और गोवर्धन पर्व का विशेष महत्व है।
माना जाता है कि जो व्यक्ति गोवर्धन पूजा के दिन प्रसन्न रहता है, उसका पूरा वर्ष सुख-समृद्धि से भरा रहता है।




















