कृष्ण-सुदामा की अद्भुत मित्रता के प्रसंग ने वहां उपस्थित सैकड़ों भक्तों को भावविभोर कर दिया। सुदामा की दयनीय दशा, भगवान में अटूट निष्ठा और सच्ची मित्रता की भावना सुनकर अनेक श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं।
इस दौरान नगर की महिलाएं अपने घरों से चावल की पोटलियां लेकर कथा स्थल पहुंचीं और सुदामा चरित्र के प्रसंग में भगवान को अर्पित कीं। यह दृश्य देखते ही पंडाल में भक्ति और समर्पण का अद्भुत माहौल बन गया।
पंडित मनोज शुक्ल ने कहा कि सुदामा दरिद्र नहीं, बल्कि आत्मकल्याण के साधक थे। उनके पास विद्या और कर्मशीलता का खजाना था, लेकिन वे भौतिक नहीं, आत्मिक समृद्धि के लिए कार्यरत थे।
उन्होंने बताया कि द्वारका में श्रीकृष्ण द्वारा सुदामा के सत्कार का अर्थ केवल व्यक्ति का नहीं, बल्कि व्यक्तित्व और चरित्र का सम्मान है। सुदामा की निष्ठा, त्याग और विनम्रता ही उनकी सच्ची संपत्ति थी।

कथा के दौरान भावपूर्ण भजनों की प्रस्तुति ने श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कृष्ण-सुदामा मिलन प्रसंग के वर्णन पर जब भगवान श्रीकृष्ण सुदामा के पैर धोते हैं, तो पंडाल में मौजूद श्रोता भावुक हो उठे। भक्ति रस से सराबोर वातावरण में श्रद्धालु झूम उठे।
कार्यक्रम के दौरान कृष्ण-रुक्मिणी, सुदामा और सुशीला की मनोहारी झांकी भी निकाली गई, जिसके दर्शन के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी।

कथा वाचक ने कहा— “सुदामा संसार के सबसे अनोखे भक्त हैं। वे जितने निर्धन दिखाई दिए, उतने ही मन से धनवान थे। उन्होंने अपने जीवन का हर सुख-दुख भगवान को अर्पित कर दिया था।”
उन्होंने आगे कहा कि सच्ची मित्रता वही है जिसमें कोई स्वार्थ न हो, और मनुष्य को जीवन में श्रीकृष्ण की तरह अपनी मित्रता निभानी चाहिए।
श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह कथा में यजमान भूपेंद्र दुबे, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती पूनम दुबे, धर्मेंद्र दुबे व श्रीमती अर्चना दुबे, अटल दुबे व श्रीमती स्वेता दुबे सहित नगर के अनेक श्रद्धालु परिवारों ने भक्ति रस का आनंद लिया और कथा श्रवण कर पुण्य लाभ अर्जित किया।




















