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545 दीप, 545 वीर — करगिल विजय दिवस पर द्रास से देशभर तक गूंजा जय हिंद….ड्रोन से लेकर दीपों तक सेना ने करगिल के शहीदों को दी अनोखी श्रद्धांजलि

देश ने नमन किया करगिल के वीरों को — 26वीं वर्षगांठ पर द्रास में हुआ अभूतपूर्व आयोजन

नई दिल्ली/द्रास।देशभर में आज करगिल विजय दिवस की 26वीं वर्षगांठ पूरे सम्मान, भाव और गर्व के साथ मनाई गई। 1999 की उस ऐतिहासिक जीत को याद करते हुए द्रास स्थित करगिल युद्ध स्मारक पर दो दिवसीय भव्य कार्यक्रम हुआ, जिसने एक बार फिर शहीदों की कुर्बानी को जन-जन तक पहुंचा दिया।

कार्यक्रम में रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, श्रम व खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया, लद्दाख के उपराज्यपाल कविन्द्र गुप्ता और थल सेनाध्यक्ष जनरल उपेन्द्र द्विवेदी सहित सैकड़ों गणमान्य लोग शामिल हुए। इस दौरान 545 दीप जलाए गए, जो हर उस शहीद का प्रतीक थे जिसने ‘ऑपरेशन विजय‘ में अपने प्राण न्योछावर किए थे। वीर नारियों और शहीद परिवारों का सम्मान भी कार्यक्रम का अहम हिस्सा रहा।

शौर्य संध्या बनी भावनाओं का समंदर
25 जुलाई की शाम ‘शौर्य संध्या’ में सेना बैंड की ‘गौरव गाथा’ गूंज उठी, धार्मिक प्रार्थनाओं में देशभक्ति छलकी और वीरता की कहानियों ने हर आंख नम कर दी। सैनिकों के परिजनों को जब मंच पर सम्मान मिला, तो द्रास की वादियों में सिर्फ तालियां ही नहीं, गर्व के आंसू भी गूंज उठे।

ड्रोन, तकनीक और आत्मनिर्भर भारत की झलक
सेना के तकनीकी प्रदर्शन में स्वदेशी ड्रोन, निगरानी तकनीक और हाई-एल्टिट्यूड युद्ध प्रणाली दिखीं। यह नजारा दिखा गया कि भारतीय सेना अब केवल सीमाओं की रखवाली नहीं, बल्कि भविष्य की तैयारियों में भी अग्रणी है।

जनरल उपेन्द्र द्विवेदी का स्पष्ट संदेश
सेना प्रमुख ने शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा – “भारत शांति चाहता है, लेकिन उकसावे पर चुप नहीं बैठेगा। सेना आतंकवाद के खिलाफ सटीक जवाब दे रही है – बिना किसी बेगुनाह को नुकसान पहुंचाए।”
उन्होंने ‘रुद्र’, ‘भैरव’, ‘शक्तिबाण’ और ‘दिव्यास्त्र’ जैसी आधुनिक सैन्य इकाइयों का ज़िक्र कर सेना की नई ताकत और विजन को सामने रखा।

तीन बड़ी विरासत पहलें
थल सेनाध्यक्ष ने तीन अहम प्रोजेक्ट्स की शुरुआत की –

इंडस व्यूपॉइंट: जहां से सिंधु नदी और युद्ध क्षेत्र दिखाई देता है

ई-श्रद्धांजलि पोर्टल: वर्चुअल श्रद्धांजलि देने का माध्यम

क्यूआर आधारित ऑडियो गेटवे: युद्ध की कहानियों को तकनीक से जोड़ने वाला मंच

545 परिवारों तक पहुंची सेना
इस बार खास बात ये रही कि सेना की 37 टीमें देशभर के हर उस शहीद के परिवार तक पहुंचीं, जिन्होंने करगिल में बलिदान दिया। नेपाल के शहीदों के परिवार भी इस सम्मान का हिस्सा बने। यह केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि पूरे देश का सामूहिक प्रणाम था।

एक याद जो मिटती नहीं
26 जुलाई की सुबह स्मारक पर जब ‘लास्ट पोस्ट’ गूंजा, तो घाटी में खामोशी और गर्व दोनों साथ बहने लगे। तिरंगा फहराया गया, सलामी दी गई और यह यकीन दोहराया गया कि “जो मिट गए वो फिर भी जिंदा हैं – देश की रगों में।”

करगिल विजय दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि वो जज्बा है जो हर हिंदुस्तानी के दिल में धड़कता है — वीरों की याद, देश का अभिमान।” 

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