वर-वधुओं को पत्तलों में भोजन, मेहमानों को प्लेट; अव्यवस्था, अफरा-तफरी और लापरवाही बनी आयोजन की पहचान
बालोद/गुंडरदेही। राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना के तहत बालोद जिले के गुंडरदेही परियोजना अंतर्गत ओटेबंद में आयोजित सामूहिक विवाह कार्यक्रम, अपने उद्देश्य की गरिमा से अधिक बदइंतजामी और मानवीय संवेदनहीनता के लिए चर्चा में आ गया।
कार्यक्रम में कुल 37 जोड़ों का विवाह संपन्न कराया गया, लेकिन यह शुभ अवसर विवाह आयोजन की अव्यवस्थाओं और प्रशासनिक चूक के कारण शर्मसार करने वाला बन गया।

भोजन व्यवस्था बनी विवाद की जड़
कार्यक्रम में शामिल वर-वधुओं और उनके परिजनों के लिए भोजन टोकन वितरण व्यवस्था इस कदर अव्यवस्थित रही कि टोकन लेने की होड़ में धक्का-मुक्की और भगदड़ जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई।स्थिति तब और बिगड़ी जब भोजन वितरण को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट की नौबत आ गई, जिसे मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों ने हस्तक्षेप कर संभाला।
सवाल यह भी उठा कि जब कार्यक्रम पूर्व निर्धारित था, तो भोजन प्रबंधन और वितरण की व्यवस्था इतनी अव्यवस्थित कैसे रही?
भेदभावपूर्ण भोजन व्यवस्था
खबरों के अनुसार, आयोजन में शामिल अतिथियों को स्टील की प्लेटों में भोजन परोसा गया, जबकि नवविवाहित जोड़ों और उनके परिवारजनों को पत्तलों में खाना दिया गया।
यह दृश्य आयोजन की संवेदनशीलता और समरसता पर सवाल खड़े करता है, जहां सामाजिक समानता का प्रतीक बनना चाहिए था यह आयोजन, वहां भेदभाव और विभाजन की मानसिकता झलकती दिखी।

सबसे शर्मनाक दृश्य – बच्चे बर्तन साफ करते हुए
इस आयोजन की सबसे गंभीर और चिंताजनक तस्वीर तब सामने आई जब 12 से 15 वर्ष आयु के मासूम बच्चे कार्यक्रम में उपयोग की गई प्लेटें और बर्तन धोते नजर आए।
सबसे गंभीर बात यह है कि यह पूरा आयोजन महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा आयोजित किया गया था — वही विभाग जिसे बच्चों की सुरक्षा, शिक्षा और अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उसी विभाग के आयोजन में इतनी बड़ी लापरवाही जो बाल श्रम कानूनों और बाल संरक्षण नीति के खुले उल्लंघन की ओर इशारा करती है।
अधिकारी ने दी सफाई, जांच का भरोसा
जब इस पूरे मामले को लेकर महिला एवं बाल विकास अधिकारी, बालोद – डीपी सिंह से बात की गई तो उन्होंने कहा:
> “भोजन व अन्य व्यवस्थाओं के लिए शासन की ओर से आठ हजार रुपये प्रति जोड़े दिए जाते हैं। बेहतर व्यवस्था और गरिमामय आयोजन के निर्देश पहले ही दिए गए थे। पत्तल में भोजन परोसना अनुचित है, इस विषय में जानकारी लेकर कार्रवाई की जाएगी। मारपीट और भगदड़ की जानकारी मुझे अब तक नहीं मिली है, लेकिन मामले की जांच करवाई जाएगी।”
प्रश्न उठते हैं… जवाब कौन देगा?
क्या आयोजन से पहले तैयारियों की निगरानी की गई थी?
क्या आयोजकों द्वारा दिए गए जिम्मेदारियों की समीक्षा की गई?
बच्चों से काम कराने की अनुमति किसने दी और यह किसकी निगरानी में हुआ?
जब शासन से पर्याप्त राशि दी जाती है, तो अव्यवस्थाओं की जिम्मेदारी किसकी?
गरिमा से नहीं, अफसरशाही से हुआ विवाह आयोजन
सरकारी योजनाएं तब ही सार्थक होती हैं जब उनका क्रियान्वयन ज़मीनी स्तर पर गरिमा, समानता और संवेदनशीलता के साथ हो। ओटेबंद का यह आयोजन एक और सरकारी योजना की जमीनी हकीकत की तस्वीर बनकर सामने आया है, जिसे अनदेखा करना न केवल नैतिक चूक होगी, बल्कि भविष्य में बच्चों के अधिकारों और सामाजिक न्याय की दिशा में गंभीर खतरा भी।
सरकार को चाहिए कि ऐसे आयोजनों में गरिमा, समानता और बाल सुरक्षा जैसे मूल्यों की सुनिश्चितता के लिए एक स्थायी मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करे — ताकि सामाजिक न्याय केवल मंच पर भाषणों तक सीमित न रहे




















