
रखरखाव में लापरवाही, मैदान बना जख्म देने वाला क्षेत्र
स्टेडियम की हालत इतनी खराब है कि चारों तरफ गंदगी, गैलरी में टूटी शराब की बोतलें, रेत और गिट्टियाँ बिखरी हुई हैं। घास लगाने के नाम पर सरकारी राशि तो खर्च की गई, लेकिन नतीजा शून्य है। जगह-जगह बिछी गिट्टियों के कारण खिलाड़ी घायल हो रहे हैं। टूटी बोतलों से पैरों में कट लगना आम हो गया है।
खिलाड़ियों की व्यथा: मैदान नहीं, मलबा मिला
स्थानीय खिलाड़ी अजय यादव राम नेताम का कहना है, “हम हर दिन सुबह-शाम अभ्यास के लिए आते हैं, लेकिन मैदान की हालत देखकर निराशा होती है। अब डर लगता है कहीं कोई गंभीर चोट न लग जाए।”
चंदन कुमार,सोनू यादव ने कहा, “कई साथी चोटिल हो चुके हैं। टूटी बोतलें और गिट्टियाँ हर जगह बिखरी हुई हैं। प्रशासन से कई बार शिकायत की, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।”

प्रेम कुमार,नवदीप ने बताया, “बालोद जैसे छोटे जिले में एक ही स्टेडियम है। अगर वो भी सुरक्षित नहीं रहा, तो हम कहां खेलें? हम मेहनत करना चाहते हैं लेकिन हमें सही मंच नहीं मिल पा रहा है।”
इस मैदान में इमरान खान,दिनेश गजेंद्र,समीर,ऋषभ बाफना,सिद्धार्थ बाफना,आशीष शर्मा, मनीष पाठक,गुमान कुमार, अनिकेत जान, और चंदन ढीमर, राहुल निर्मलकर, ईश्वर ठाकुर,जैसे कई स्थानीय खिलाड़ी नियमित रूप से अभ्यास करते हैं,तो वही पुलिस, अर्ध सैनिक,सेना और अन्य शासकीय सेवाओ में जाने से पहले दूर दराज से युवा इस मैदान में आकर अपना अभ्यास भी करते रहे है,लेकिन अब स्टेडियम की हालत उन्हें पीछे हटने को मजबूर कर रही है।
खिलाड़ियों की उम्मीदें जनप्रतिनिधियों से
जिला प्रशासन और खेल विभाग की अनदेखी के कारण खिलाड़ियों में आक्रोश है, लेकिन हाल ही में निर्वाचित हुए जनप्रतिनिधियों से अब सभी को उम्मीद है कि वे मैदान की हालत सुधारने के लिए ठोस कदम उठाएंगे।
पुनर्जीवन की जरूरत
स्टेडियम को साफ-सुथरा, सुरक्षित और खेल के योग्य बनाने की जरूरत है। एक सशक्त खेल अवसंरचना ही युवाओं को नशे और अपराध की ओर जाने से रोक सकती है। अगर जल्द ही पहल नहीं की गई, तो बालोद जैसे छोटे शहर की खेल प्रतिभाएं गुमनामी में खो जाएंगी।
अब वक्त है कि जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि जागें और इस स्टेडियम को फिर से खेल का केंद्र बनाएं।




















