बालोद-जिला मुख्यालय के धड़ी चौक में स्थित निर्मित नेकी की दीवार के आसपास कबाड़ फैला हुआ है। न तो जूते काम लायक हैं और न ही कपड़े। यह गंदी, संक्रमित और अनुपयोगी सामग्री वे गरीब लोग तो नहीं छूते।बालोद शहर में विकास के नाम पर कुछ ऐसे काम हो रहे हैं, जिनकी उपयोगिता पर अब सवाल उठने लगे हैं। जिला मुख्यालय के धड़ी चौक के पास बनाई गई नेकी की दीवार को लेकर भी इसी तरह का देखा जा रहा है। हजारो रुपए खर्च कर बनाई गई इस दीवार का मुख्य उद्देश्य था कि यहां लोग अपने पुराने कपड़े, जूते और पुस्तक-कॉपी दान करें, जिससे कि वह किसी जरूरतमंद के काम आ पाए। लेकिन हजारो रुपए खर्च कर बनाई गई इस दीवार में इतनी भी जगह नहीं है कि दान में मिले कपड़े, जूते और किताबों को सुरक्षित रखा जा सके। अभी भीषण गर्मी में दान में मिले सामान खराब होकर बिखरे हुए हैं। वहां न इन्हें रखने की जगह है न ही देखरेख की जा रही हैं।बस एक दीवार को पेंट कर दिया है। कुछ कीले कपड़े टांगने के लिए लगा दिए हैं, लेकिन कपड़े को धूप या बारिश से बचाने के लिए कोई छांव की व्यवस्था नहीं है। जिसके कारण कपड़े खराब हो रहे हैं, वहीं नीचे में गिरे कपड़े को जानवर रौद देते हैं। जिसके बाद वह किसी के उपयोग का लायक नहीं रहता।
नेकी की दीवार में नही है छाँव कपड़े हो रहे खराब
जो भी सामान लोगों ने जरूरतमंदों के लिए दान किए हैं, उसे रखने की जगह ही नहीं है। जिला मुख्यालय के धड़ी चौक के पास जरूरतमंदाें के लिए नेकी की दीवार कुछ साल पहले बनाई गई थी। जहां पर जिनको आवश्यकता ना हो वह अपने उपयोग किए हुए कपड़े आदि छोड़ जाते थे। जिसे गरीब तबके के लोग अपनी जरूरत के हिसाब से लेकर चले जाते थे। कुछ दिनों तक यह बढ़िया चला। नेकी की दीवार के ऊपर शीट नही लगाया गया जिसके कारण बरसात से कपड़ा भीग जाता हैं और धूप से कपड़े खराब हो रही हैं ।
सुरक्षा की नहीं कोई व्यवस्था
नगर पालिका ने नेकी की दीवार बना तो दी, लेकिन यहां आने वाले सामान की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम की व्यवस्था नहीं की हैं। लेकिन हवा के साथ कपड़े और सामान उड़कर सड़क पर बिखर जाता है। इससे सामान लोगों के उपयोग के लायक नहीं रहता। नेकी की दीवर बनाने वाली नगर पालिका को सामान की सुरक्षा के पुख्ता इंतेजाम की व्यवस्था करवानी चाहिए। तभी इस नेकी के काम किसी की नेकी कर पाएगा।
क्या था उद्देश्य
गरीब लोगों की मदद के लिए यहां पर कपड़े, जूते व कई जरूरत की वस्तुएं यहां लोगों द्वारा रखी जाती है, ताकि किसी गरीब की जरूरत पूरी हो सके, लेकिन यहां के हालात देख कर लगता है कि गरीब यहां से कुछ भी ले जाना पसंद नहीं करते हैं।
कपड़ों को फैला रहे मवेशी
कोरोनाकाल के समय दो साल तक लोग कपड़े नहीं रख् रहे थे। लेकिन अब लोग फिर से कपड़े रख रहे हैं लेकिन यहां उचित व्यवस्था नहीं है। वर्तमान में कई कपड़े बिखर रहे हैं। कुत्ते, सुअर व मवेशी कपड़े को फैला रहे हैंं। हवा चलने पर कपड़ा उड़कर बिखरने लगा है।