राष्ट्रीय बालिका दिवस स्पेशल
बालोद बेटियों ने अपने हौसलों से हर मुश्किल आसान की है…. अब बेटियां बदलाव की स्याही से जिंदगी की इबारत लिख रही है…. बालोद जिले की एक बेटी जो आज अपने छोटे से उम्र में बड़े बड़ो के लिए एक मिशाल बनकर उभरी हैं… महज 15 साल की उम्र में ही एक तरफ अपनी स्कूली शिक्षा में दक्षता हासिल की तो वही इस आधुनिक युग में कत्थक नृत्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर तक प्रदर्शन कर कई अवार्ड भी हासिल कर चुकी हैं…. यही नही स्कूली शिक्षा के अलावा आज छत्तीसगढ़ के एकमात्र संगीत विश्वविद्यालय में भी इस कथक नृत्य का विषय लेकर डिप्लोमा कोर्स भी कर रही हैं…. इस बेटी का नाम अनुकृति हैं…. जो महज 5 साल की उम्र से अपने नाम के अनुरूप जाकर इस मुकाम पर पहुंची हैं…. इस छोटी सी बालिका अनुकृति की आज के पाश्चात्यकला को चुनौती देते हुए पुराने संस्कृति शास्त्रीय नृत्य को सहेजने की दिशा में इस अनोखी पहल की चर्चा प्रदेश भर में हो रही है…. देखे पूरी खबर
बालोद जिले में लौहनगरी के नाम से मशहूर दल्लीराजहरा की रहने वाली 15 वर्षीय बेटी अनुकृति मानस 5 साल की उम्र से ही कत्थक सीख रही है… अब तक अनुकृति ने नेपाल, आजमगढ़, जमशेदपुर सहित विभिन्न स्थानों में अपनी प्रस्तुति दी है…. और कई अवार्ड भी अपने नाम किये हैं…. अनुकृति छत्तीसगढ़ के एकमात्र इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय से 8 साल का कथक नृत्य का विषय लेकर डिप्लोमा कोर्स भी कर रही है…. वर्तमान में अनुकृति को कोर्स करते 6 साल हो गए है…. अनुकृति बताती हैं कि बचपन से ही टेलीविजन में कत्थक नृत्य देखकर नृत्य करने का मन किया…. तैयार होकर पैरों में घुंघरू बांधकर कत्थक नृत्य करने में बहुत खुशी होती है…. अनुकृति आगे बताती है कि कत्थक नृत्य धीरे धीरे विलुप्त होते जा रहा है… लेकिन वे इसे आगे लेकर जाना चाहती है… और अपना नृत्य पूरी दुनिया को दिखाना चाहती है….

अनुकृति की माँ किरण भी अपनी बेटी की इस उपलब्धि पर खुश है…. और अपनी बेटी अनुकृति पर नाज़ करते हुए बताती है कि उनकी रुचि थी कि वे अनुकृति को क्लासिकल डांस का ही प्रशिक्षण दे…. जिसके बाद कत्थक नृत्य की टीचर मिलने के बाद ही सम्भव हो पाया और आज अनुकृति ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रस्तुति देकर कई अवार्ड भी जीते है…. अनुकृति की कत्थक टीचर डॉ. रुणा दास का मानना है कि कत्थक एक ऐसा नृत्य हैं जिसमें मुद्राएं होती है, भाव होती है और आजकल के वेस्टर्न डांस भावहीन होते है…. और एकमात्र शास्त्रीय नृत्य होते है जिसमें भाव होता है… और ये आवभाव अनुकृति के अंदर बचपन से ही नज़र आती है…. कत्थक नृत्य के प्रति समर्पण है
.”अनुकृति” इसका मतलब ही होता है कि किसी भी रचना को देखकर वैसा करना..और दल्लीराजहरा की अनुकृति ने भी कुछ ऐसा किया..महज 5 साल की उम्र में टीवी पर कत्थक नृत्य देखकर उनके मन मे ईच्छा हुई कि वे भी ऐसी नृत्य की प्रस्तुति बड़े मंचो पर दे..और तब से लेकर आज तक पीछे मुड़कर नही देखी…और महज 15 साल की उम्र में कत्थक नृत्य से बड़े बड़े कथाओं का अनुभव करा रही है।




















