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बालोद कुटुंब न्यायालय द्वारा दिये गए डीएनए टेस्ट के फैसले पर उच्च न्यायालय ने लगाई रोक,पति पत्नी में आखिर ऐसा क्या हुआ कि मामला डीएनए टेस्ट तक पहुंचा

बालोद-कभी कभी पारिवारिक विवाद इतना बढ़ जाता है कि, लोग अपने ही संतान को अपना खून (वंश) होने से इंकार कर देता है, ..ऐसा विवाद उत्पन्न होने पर, इसका निराकरण के लिये परिवार न्यायालय में इस बात का दावा लाना होता है कि, “फला बच्चा मेरा नही है घोषित किया जाए” .ऐसा ही एक मामला बालोद के परिवार न्यायालय में पेश हुआ है। चोवराम ने अपनी पत्नी निशा साहू (बदला हुआ नाम) के विरुद्ध इस बात का दावा पेश किया था कि, निशा के गर्भ से जन्मी बच्ची सुमिरन, को उनका पुत्री नही होना घोषित किया जाए। इस बाबत DNA टेस्ट कराने हेतु चोवराम की ओर से खर्च की राशि जमा कर दी गई थी। निशा की ओर से अधिवक्ता भेषकुमार साहू के द्वारा जबाव पेश कर तर्क में बताया था कि, एक बार किसी आवेदन पर न्यायालय के द्वारा आदेश पारित कर दिया गया है, तो उसके विपरीत आदेश, दूसरी बार पेश सेम आवेदन पर पारित नही किया जा सकता है, ऊक्त तर्क को न्यायालय द्वारा अमान्य करते हुए, DNA टेस्ट की अनुमति प्रदान कर दी गई थी। ऊक्त आदेश को निशा ने अधिवक्ता शिखर शर्मा के माध्यम से माननीय हाई कोर्ट में चुनौती दी थी । जिस पर हाई कोर्ट ने आगामी आदेश तक स्थगन आदेश (स्टे) प्रदान किया है। गरीब महिला निशा के शुभचिंतकों एवं महिला के सम्मान के लिये कार्य करने वाली संस्था के द्वारा अधिवक्ता भेषकुमार साहू और शिखर शर्मा को बधाई देते हुए उज्जवल भविष्य की कामना की है।

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