Skip to main content

प्रदेश रूचि

खिलाड़ियों के सपनों का मैदान या आयोजनों का स्थायी स्थल, सरयू प्रसाद अग्रवाल स्टेडियम की बदलती तस्वीर पर सवाल

बालोद। जिला मुख्यालय का सरयू प्रसाद अग्रवाल स्टेडियम इन दिनों फिर एक बड़े आयोजन की तैयारियों को लेकर चर्चा में है। 17 सितंबर को यहां ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम आयोजित किया जाना है। प्रशासन आयोजन की तैयारियों में जुटा है और निश्चित रूप से ऐसे कार्यक्रम जनभागीदारी तथा सामाजिक सहभागिता का अवसर प्रदान करते हैं। लेकिन इस आयोजन से अलग स्टेडियम को लेकर एक ऐसा सवाल भी है, जिस पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है—क्या आयोजन के साथ-साथ इस मैदान के मूल उद्देश्य और खिलाड़ियों के हितों का संरक्षण भी सुनिश्चित किया जा सकता है?


सरयू प्रसाद अग्रवाल स्टेडियम केवल सरकारी आयोजन का स्थल नहीं है। इसकी पहचान एक खेल मैदान के रूप में हुई है और इसके पीछे एक महत्वपूर्ण सामाजिक भावना जुड़ी है। शहर में खेल मैदान की कमी को देखते हुए तत्कालीन विधायक लोकेंद्र यादव के प्रयास से अग्रवाल परिवार से जमीन उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया था। इसके बाद स्व. धर्म प्रकाश अग्रवाल ने खेल मैदान के लिए करीब चार एकड़ भूमि दान की। वर्ष 1990 में निर्माण प्रक्रिया शुरू हुई और वर्ष 2006 में स्टेडियम का लोकार्पण हुआ।
दान की गई इस जमीन के पीछे उद्देश्य बालोद के बच्चों और खिलाड़ियों को बेहतर अभ्यास का अवसर उपलब्ध कराना था। इसलिए आज इस स्टेडियम की चर्चा केवल इसकी भौतिक स्थिति तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उस भावना तक भी पहुंचनी चाहिए जिसके तहत जमीन दान की गई थी।


खिलाड़ी अपने संसाधनों से तैयार करते हैं पिच
स्टेडियम में क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी लंबे समय से अपने स्तर पर मैदान को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। खिलाड़ियों के अनुसार वे आपस में राशि जुटाकर हर साल करीब 20 से 30 हजार रुपए खर्च कर टर्फ पिच तैयार करते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद यह प्रयास इसलिए किया जाता है, ताकि उन्हें नियमित अभ्यास और क्रिकेट खेलने के लिए बेहतर स्थान मिल सके।
लेकिन जब स्टेडियम में स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस अथवा अन्य सरकारी आयोजन होते हैं, तब मैदान को आयोजन के अनुरूप तैयार किया जाता है। इसी दौरान खिलाड़ियों द्वारा तैयार की गई पिच को नुकसान पहुंचने की स्थिति बनती है। इस बार भी पिच पर बजरी-गिट्टी डालकर रोलर चलाए जाने से खिलाड़ियों की मेहनत प्रभावित हुई। अब पिच को दोबारा तैयार करने का खर्च भी खिलाड़ियों को ही उठाना पड़ेगा।
यहां सवाल किसी आयोजन के होने या न होने का नहीं है। सवाल इतना है कि जिस मैदान पर आयोजन हो, वहां आयोजन समाप्त होने के बाद खिलाड़ियों के मैदान को भी उसी गंभीरता से वापस तैयार किया जाए।


गड्ढों के बीच भविष्य की तैयारी
इसी स्टेडियम में रोजाना कई युवा पुलिस, सेना और अर्धसैनिक बलों की भर्ती की तैयारी के लिए दौड़ और शारीरिक अभ्यास करते हैं। मैदान की ऊबड़-खाबड़ सतह, गड्ढे और बजरी उनके अभ्यास में परेशानी पैदा करते हैं।
इन युवाओं के लिए यह मैदान केवल खेलने की जगह नहीं, बल्कि उनके भविष्य की तैयारी का एक महत्वपूर्ण साधन है। रोजाना घंटों अभ्यास करने वाले युवाओं को यदि सुरक्षित और व्यवस्थित रनिंग ट्रैक तक उपलब्ध नहीं हो, तो उनकी कठिनाई को समझना मुश्किल नहीं है। जिले में खेल सुविधाओं का विस्तार और युवाओं को आगे बढ़ाने की योजनाएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनकी सफलता का वास्तविक मूल्यांकन मैदान पर दिखाई देने वाली सुविधाओं से ही होगा।
सुरक्षा व्यवस्था भी जरूरी
स्टेडियम में नगर पालिका द्वारा सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे, लेकिन इनके संचालन और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मैदान में नियमित सुरक्षा की व्यवस्था नहीं होने से असामाजिक तत्वों की आवाजाही की शिकायतें सामने आती रही हैं। खेल सामग्री और खिलाड़ियों के लिए उपलब्ध संसाधनों की सुरक्षा के लिए कैमरों के साथ प्रभावी निगरानी व्यवस्था भी जरूरी है।

 


आयोजन भी हो, खेल भी चले—यही संतुलन जरूरी

सरयू प्रसाद अग्रवाल स्टेडियम में होने वाला कोई भी सामाजिक या शासकीय आयोजन अपने आप में समस्या नहीं है। शहर को बड़े कार्यक्रमों के लिए स्थान मिलना भी आवश्यक है। जरूरत केवल इतनी है कि आयोजन और खेल गतिविधियों के बीच संतुलन कायम रहे। कार्यक्रमों के लिए मैदान का इस्तेमाल किया जाए, लेकिन आयोजन समाप्त होने के बाद गड्ढे भरे जाएं, बजरी-गिट्टी हटाई जाए, मैदान समतल किया जाए और खिलाड़ियों द्वारा अपने संसाधनों से तैयार की गई पिच को यथासंभव सुरक्षित रखा जाए। यदि किसी कारण से पिच या मैदान को नुकसान पहुंचता है तो उसे दोबारा तैयार कराने की जिम्मेदारी भी तय हो।
आखिर यह स्टेडियम सिर्फ ईंट, सीमेंट और मैदान का टुकड़ा नहीं है। इसके पीछे एक परिवार का दान, शहर की खेल जरूरत और हजारों खिलाड़ियों-युवाओं की उम्मीदें जुड़ी हैं।
आशीर्वाद का दीया’ रोशनी और जनभागीदारी का संदेश लेकर आए, लेकिन उसी रोशनी में सरयू प्रसाद अग्रवाल की उस भावना को भी देखा जाए, जिसके तहत उन्होंने अपनी जमीन बालोद के खिलाड़ियों के भविष्य के लिए दान की थी। आयोजन होते रहें, लेकिन आयोजन के बाद मैदान खिलाड़ियों का भी उतना ही रहे—शायद यही उस दान का सबसे बड़ा सम्मान होगा।

 

खेल प्रतिभाओं के लिए दान में मिली जमीन बनी आयोजनों का मैदान, अब बदहाली से जूझ रहे खिलाड़ी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!