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खेल प्रतिभाओं के लिए दान में मिली जमीन बनी आयोजनों का मैदान, अब बदहाली से जूझ रहे खिलाड़ी

स्वतंत्रता दिवस के बाद भी नहीं भरे गड्ढे, मैदान में पड़ी बजरी-गिट्टी बनी परेशानी; करोड़ों खर्च के बावजूद स्टेडियम की हालत जस की तस

बालोद। जिले में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है। स्कूल गेम्स से लेकर ओपन गेम्स तक जिले के कई खिलाड़ी राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर बालोद का नाम रोशन कर चुके हैं। इसके बावजूद जिला मुख्यालय में खिलाड़ियों के नियमित अभ्यास के लिए एक भी ऐसा सर्वसुविधायुक्त और व्यवस्थित स्टेडियम नहीं है, जहां वे सुरक्षित और बेहतर तरीके से अपनी तैयारी कर सकें। जिला मुख्यालय स्थित सरयू प्रसाद अग्रवाल स्टेडियम की मौजूदा स्थिति इस विडंबना को साफ तौर पर सामने रखती है।

           नाली को पाटकर समतल करते खिलाड़ी

जिस मैदान को खिलाड़ियों और खेल प्रतिभाओं के भविष्य को संवारने के उद्देश्य से विकसित किया गया था, वह अब समय-समय पर होने वाले सरकारी आयोजनों के बाद बदहाल छोड़ दिए जाने से सवालों के घेरे में है। मैदान में गड्ढे, ऊबड़-खाबड़ सतह और जगह-जगह पड़ी बजरी-गिट्टी खिलाड़ियों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या स्टेडियम खिलाड़ियों के अभ्यास का मैदान है या फिर सरकारी आयोजनों का अस्थायी स्थल बनकर रह गया है?

स्वतंत्रता दिवस के बाद मैदान की नहीं ली सुध

बीते माह स्वतंत्रता दिवस समारोह के आयोजन के दौरान मैदान में जगह-जगह गड्ढे खोदकर बांस की बल्लियां लगाई गई थीं। मैदान में पानी जमा न हो और आयोजन में किसी तरह की बाधा न आए, इसके लिए अस्थायी नाली भी बनाई गई थी। आयोजन समाप्त होने के बाद बांस की बल्लियां तो हटा ली गईं, लेकिन उन्हें लगाने के लिए खोदे गए गड्ढे लंबे समय बाद भी नहीं भरे गए।

इसके अलावा मैदान के चारों ओर ट्रैक तैयार करने के लिए डाली गई बजरी-गिट्टी भी अब तक पूरी तरह नहीं हटाई गई है। इससे मैदान का बड़ा हिस्सा असमतल और असुरक्षित हो गया है। ट्रैक पर दौड़ने के दौरान बजरी के कारण फिसलने का खतरा है, वहीं मैदान के किनारे ऊबड़-खाबड़ होने से पैर मुड़ने अथवा चोट लगने की आशंका बनी रहती है।

पुलिस और सेना भर्ती की तैयारी करने वाले युवाओं की बढ़ी परेशानी

स्टेडियम में प्रतिदिन पुलिस भर्ती के साथ ही सेना और अर्धसैनिक बलों में भर्ती की तैयारी करने वाले युवा दौड़ और शारीरिक अभ्यास के लिए पहुंचते हैं। मैदान की खराब स्थिति के कारण उन्हें नियमित रूप से दौड़ लगाने में परेशानी हो रही है। बजरी-गिट्टी वाले ट्रैक पर दौड़ने से फिसलने का डर बना रहता है, जबकि मैदान में मौजूद गड्ढों के कारण चोट लगने की आशंका रहती है।

युवाओं का कहना है कि अभ्यास के लिए आने के बावजूद उन्हें पूरे मैदान में दौड़ने के बजाय छोटे-छोटे समतल हिस्सों में अभ्यास करना पड़ रहा है। जिस मैदान का इस्तेमाल युवाओं की शारीरिक तैयारी के लिए होना चाहिए, वही मैदान अब उनके लिए जोखिम पैदा कर रहा है।

 

अस्थायी नाली पाटने में भी खानापूर्ति

स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पानी निकासी के लिए बनाई गई अस्थायी नाली भी आयोजन के बाद मैदान में बनी रही। स्थानीय लोगों की शिकायत के बाद इसे पाटने का प्रयास किया गया, लेकिन व्यवस्थित तरीके से मिट्टी भरकर मैदान को समतल करने के बजाय जेसीबी से सिर्फ समतलीकरण का प्रयास किया गया। इससे मैदान की सतह और अधिक ऊबड़-खाबड़ हो गई।

स्थानीय लोगों और खिलाड़ियों का कहना है कि आयोजन के दौरान मैदान में किए जाने वाले अस्थायी निर्माण और बदलाव को आयोजन समाप्त होने के बाद व्यवस्थित तरीके से हटाकर मैदान को पूर्व स्थिति में लाने की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

अग्रवाल परिवार ने खेल मैदान के लिए दान की थी करीब चार एकड़ जमीन

सरयू प्रसाद अग्रवाल स्टेडियम का निर्माण बालोद के लिए एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में हुआ था। शहर में खेल मैदान की कमी को देखते हुए तत्कालीन विधायक लोकेंद्र यादव के प्रयास से अग्रवाल परिवार से जमीन उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया था। इसके बाद स्व. धर्म प्रकाश अग्रवाल ने खेल मैदान निर्माण के लिए करीब चार एकड़ भूमि दान में दी।

वर्ष 1990 में स्टेडियम निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई और वर्ष 2006 में इसका लोकार्पण किया गया। अग्रवाल परिवार की इस पहल से बालोद शहर को ऐसा खेल मैदान मिला, जहां स्थानीय खिलाड़ी अभ्यास कर अपनी प्रतिभा को आगे बढ़ा सकें।

लेकिन वर्तमान स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि जिस जमीन को खेल प्रतिभाओं के भविष्य के लिए दान किया गया था, क्या उसका इस्तेमाल और संरक्षण उसी उद्देश्य के अनुरूप हो रहा है?

मरम्मत के नाम पर खर्च, फिर भी नहीं बदली तस्वीर

स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार पिछले करीब दस वर्षों में स्टेडियम पर चार करोड़ रुपए से अधिक की राशि विभिन्न कार्यों और मरम्मत के नाम पर खर्च की जा चुकी है। इसके बावजूद स्टेडियम की स्थिति में अपेक्षित सुधार नजर नहीं आता। पवेलियन बदहाल है, ड्रेसिंग रूम की स्थिति भी ठीक नहीं है। नालियां टूटी हुई हैं और नेट प्रैक्टिस क्षेत्र भी बेहतर स्थिति में नहीं है।

पूर्व में मैदान को संवारने के लिए घास लगाने सहित कई कार्यों पर राशि खर्च की गई, लेकिन नियमित रखरखाव और ठोस प्रबंधन व्यवस्था के अभाव में कुछ समय बाद मैदान फिर बदहाल हो जाता है। इससे सवाल उठता है कि बार-बार मरम्मत और सौंदर्यीकरण पर राशि खर्च करने के बावजूद स्टेडियम की स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं सुधर पा रही है।

खिलाड़ियों की प्रतिभा के सामने सुविधाओं का संकट

बालोद जिले के खिलाड़ियों ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। कई खिलाड़ियों ने स्कूल गेम्स और ओपन गेम्स में पदक हासिल किए हैं। इसके बावजूद जिला मुख्यालय में उनके लिए सुरक्षित और सुविधायुक्त अभ्यास स्थल का अभाव खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने की राह में बड़ी बाधा है।

खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के लिए केवल प्रतियोगिताओं का आयोजन पर्याप्त नहीं है। खिलाड़ियों को सालभर अभ्यास के लिए बेहतर मैदान, सुरक्षित रनिंग ट्रैक, ड्रेसिंग रूम, पवेलियन और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

दानदाता की भावना के सम्मान की जरूरत

सरयू प्रसाद अग्रवाल स्टेडियम सिर्फ एक सरकारी संपत्ति नहीं, बल्कि उस भावना की भी निशानी है जिसके तहत अग्रवाल परिवार ने खेल गतिविधियों और बालोद क्षेत्र के युवाओं को खेल सुविधाओं का लाभ मिलने के उद्देश्य से करीब चार एकड़ जमीन दान की थी। ऐसे में मैदान का बार-बार आयोजनों के लिए इस्तेमाल होना और आयोजन समाप्त होने के बाद उसे बदहाल छोड़ दिया जाना दान के मूल उद्देश्य पर भी सवाल खड़ा करता है।

अब जरूरत है कि प्रशासन और संबंधित विभाग स्टेडियम को केवल आयोजन स्थल के रूप में देखने के बजाय बालोद जिले की खेल प्रतिभाओं के स्थायी अभ्यास केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। साथ ही आयोजनों के बाद मैदान को पूर्व स्थिति में लाने की जिम्मेदारी भी संबंधित एजेंसी की तय हो, ताकि खिलाड़ियों और भर्ती की तैयारी करने वाले युवाओं को सुरक्षित एवं व्यवस्थित अभ्यास का अवसर मिल सके।

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