बालोद। छत्तीसगढ़ की राजनीति में शिक्षा हमेशा से केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं रही, बल्कि यह सामाजिक बदलाव और राजनीतिक दावों का भी महत्वपूर्ण आधार रही है। इसी कड़ी में स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय योजना ने प्रदेश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को एक अलग पहचान दी। वर्ष 2020 में 51 स्कूलों से शुरू हुआ यह प्रयोग कुछ ही वर्षों में सैकड़ों विद्यालयों तक पहुंचा और सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने की कोशिश के रूप में चर्चा में आया। आज प्रदेश में 751 स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय संचालित हैं। लेकिन सरकार बदलने के बाद इसी व्यवस्था में कक्षा 9वीं से 12वीं तक शुल्क लगाए जाने के फैसले ने शिक्षा से अधिक राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है।
नए शैक्षणिक सत्र से कक्षा 9वीं और 10वीं के विद्यार्थियों से 500 रुपए तथा कक्षा 11वीं और 12वीं के विद्यार्थियों से 550 रुपए स्थानीय शुल्क लिए जाने का प्रावधान किया गया है। राशि बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन सवाल रकम का कम या ज्यादा होना नहीं, बल्कि उस सरकारी शिक्षा मॉडल की मूल भावना का है जिसे आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विकल्प बनाने का दावा किया गया था।

यही बिंदु अब कांग्रेस के राजनीतिक हमले का आधार बन गया है। संजारी-बालोद विधायक एवं प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष संगीता सिन्हा ने शुल्क वसूली को लेकर राज्य सरकार को घेरा है। उनका आरोप है कि जिस आत्मानंद मॉडल का उद्देश्य सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को बेहतर और निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराना था, उसी व्यवस्था में अब फीस लगाकर सरकार शिक्षा को आय का साधन बनाने की दिशा में बढ़ रही है।
संगीता सिन्हा के तर्क का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि आत्मानंद स्कूल कांग्रेस सरकार की प्रमुख शिक्षा पहलों में शामिल रहे थे। लिहाजा वर्तमान सरकार द्वारा इसमें किए गए बदलाव को कांग्रेस केवल प्रशासनिक निर्णय के रूप में नहीं, बल्कि पिछली सरकार की नीतियों से वैचारिक अंतर के रूप में भी प्रस्तुत कर रही है। दूसरी ओर, सरकार के लिए यह निर्णय स्कूलों के संचालन, स्थानीय आवश्यकताओं और संसाधनों से जुड़ा प्रशासनिक विषय हो सकता है। यही अंतर आने वाले समय में राजनीतिक बहस को और धार दे सकता है।
इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक पक्ष ग्रामीण और निम्न-मध्यमवर्गीय परिवारों से जुड़ा है। निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की फीस वहन करने में असमर्थ परिवारों के लिए आत्मानंद विद्यालयों ने एक वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराया था। ऐसे में सवाल यह है कि क्या शुल्क की शुरुआत भविष्य में इन विद्यालयों की पहुंच और लोकप्रियता को प्रभावित करेगी? या फिर निर्धारित मामूली राशि विद्यालयों की सुविधाओं और स्थानीय जरूरतों के लिए उपयोगी संसाधन साबित होगी?
संगीता सिन्हा ने सरकार के शिक्षा बजट पर भी सवाल उठाते हुए पूछा है कि जब स्कूल शिक्षा के लिए हजारों करोड़ रुपए का प्रावधान किया जाता है, तब विद्यार्थियों से शुल्क लेने की आवश्यकता क्यों पड़ी। उन्होंने सरकार से इस निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए शुल्क वापस लेने की मांग की है।
दरअसल, आत्मानंद स्कूलों की कहानी अब केवल स्कूलों और फीस की कहानी नहीं रह गई है। यह छत्तीसगढ़ में सरकारी शिक्षा की दिशा और उसकी प्राथमिकताओं को लेकर उठता बड़ा सवाल बन चुकी है। कांग्रेस इसे गरीब परिवारों के बच्चों पर आर्थिक बोझ और अपनी पिछली सरकार की शिक्षा नीति को कमजोर करने के रूप में देख रही है, जबकि सरकार के सामने चुनौती यह साबित करने की होगी कि शुल्क का निर्णय शिक्षा के व्यावसायीकरण की दिशा में कदम नहीं, बल्कि व्यवस्था की जरूरतों से जुड़ा व्यावहारिक फैसला है।
देखना होगा आने वाले वर्षों में आत्मानंद विद्यालय इस बात की कसौटी बन सकते हैं कि छत्तीसगढ़ में सरकारी शिक्षा का मॉडल मुफ्त सुविधा, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवा या सीमित शुल्क वाली संस्थागत व्यवस्था—किस दिशा में आगे बढ़ता है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे असली फैसला इसी बात से होगा कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को बेहतर शिक्षा कितनी मिलती है और उस शिक्षा तक पहुंच कितनी सहज बनी रहती है।













