
जानकारी के अनुसार डिवाइडर निर्माण के दौरान प्रारंभिक चरण में सीमेंट-कंक्रीट के बेस ब्लॉकों में एंकर बोल्ट की सहायता से लोहे के पोल लगाए गए थे। लेकिन अब उन्हीं पोलों के चारों ओर कंक्रीट मिक्सर की मदद से नया कंक्रीट डालकर अतिरिक्त ब्लॉक तैयार किए जा रहे हैं। कई स्थानों पर यह कार्य जारी है। निर्माण की इस बदली हुई प्रक्रिया को देखकर राहगीरों और स्थानीय लोगों के बीच तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लोगों का कहना है कि यदि प्रारंभिक निर्माण निर्धारित तकनीकी मानकों और स्वीकृत डिज़ाइन के अनुरूप किया गया था, तो कुछ ही समय बाद इस प्रकार अतिरिक्त कंक्रीट डालकर आधार को मजबूत करने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ गई।

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि यह पूरा घटनाक्रम निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है। उनका कहना है कि यदि शुरुआत से ही मजबूत फाउंडेशन, निर्धारित गुणवत्ता की सामग्री और सही तकनीकी प्रक्रिया का पालन किया गया होता, तो बाद में इस तरह सुधारात्मक कार्य करने की जरूरत नहीं पड़ती। लोगों का यह भी कहना है कि निर्माण कार्य में यदि किसी प्रकार की तकनीकी कमी सामने आई है तो उसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए, ताकि करोड़ों रुपये की लागत से बन रहे इस प्रोजेक्ट की वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
तकनीकी जानकारों के अनुसार किसी भी सड़क डिवाइडर की मजबूती केवल ऊपर दिखाई देने वाले कंक्रीट पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके फाउंडेशन, एंकर बोल्ट की क्षमता, स्टील रिइन्फोर्समेंट, कंक्रीट की गुणवत्ता, उसकी क्योरिंग और निर्धारित डिज़ाइन के अनुरूप निर्माण पर आधारित होती है। यदि किसी पोल के आधार को निर्माण के तुरंत बाद अतिरिक्त कंक्रीट से मजबूत करना पड़ रहा है, तो सामान्य रूप से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रारंभिक आधार अपेक्षित मजबूती प्रदान नहीं कर पा रहा था या फिर किसी तकनीकी संशोधन के तहत यह कार्य किया जा रहा है। हालांकि इसका स्पष्ट कारण संबंधित निर्माण एजेंसी और राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग ही बता सकते हैं।

इस पूरे मामले में राष्ट्रीय राजमार्ग विभाग के तकनीकी अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण कार्य की नियमित निगरानी करना और गुणवत्ता सुनिश्चित करना विभाग के उप अभियंता, सहायक अभियंता तथा एसडीओ जैसे अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है। यदि प्रारंभिक निर्माण सही था तो बाद में अतिरिक्त कंक्रीट डालने की आवश्यकता क्यों पड़ी, और यदि निर्माण में कोई तकनीकी कमी थी तो उसे उसी समय क्यों नहीं रोका गया। इन सवालों के चलते विभाग की गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

राष्ट्रीय राजमार्ग-930 जिले का प्रमुख यातायात मार्ग है, जहां प्रतिदिन हजारों छोटे-बड़े वाहन गुजरते हैं। इस मार्ग पर कई स्थानों पर वाहन 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलते हैं। ऐसे में यदि डिवाइडर पोल या उनका आधार अपेक्षित मजबूती का नहीं हुआ तो भविष्य में सड़क सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डिवाइडर केवल सड़क को विभाजित करने का साधन नहीं होते, बल्कि आमने-सामने की टक्कर जैसी गंभीर दुर्घटनाओं को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए इनके निर्माण में गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए।
इधर स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए तथा उपयोग की गई निर्माण सामग्री और गुणवत्ता का परीक्षण कराया जाए। उनका कहना है कि यदि निर्माण कार्य पूरी तरह तकनीकी मानकों के अनुरूप है तो विभाग को स्वयं आगे आकर इसकी जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, जिससे लोगों के मन में उठ रहे संदेह समाप्त हो सकें। वहीं यदि जांच में किसी प्रकार की तकनीकी खामी या निर्माण में लापरवाही सामने आती है तो संबंधित एजेंसी और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।




















