बालोद। जिला न्यायालय बालोद ने तीन लाख रुपये के चेक अनादरण (चेक बाउंस) के एक महत्वपूर्ण मामले में आरोपी प्रधान पाठक षडप्रकाश किरण कटेन्द्र को दोषी करार देते हुए छह माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई है। न्यायालय ने परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के तहत अपराध सिद्ध पाए जाने पर यह फैसला सुनाया। न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि चेक बाउंस केवल आर्थिक लेन-देन का विवाद नहीं, बल्कि एक ऐसा आपराधिक कृत्य है जो बैंकिंग व्यवस्था और वित्तीय लेन-देन की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
प्रकरण के अनुसार आरोपी षडप्रकाश किरण कटेन्द्र, निवासी वार्ड क्रमांक-20, ग्राम नागाडबरी, पोस्ट निपानी, जिला बालोद ने घरेलू आवश्यकताओं का हवाला देते हुए परिवादी रोशनी सिंह से तीन लाख रुपये उधार लिए थे। दोनों के बीच पूर्व से अच्छे संबंध होने के कारण परिवादी ने आरोपी को दो अलग-अलग चेकों के माध्यम से डेढ़-डेढ़ लाख रुपये प्रदान किए थे।
राशि प्राप्त करने के बाद आरोपी ने 30 जनवरी 2026 को साक्षियों एवं नोटरी के समक्ष एक इकरारनामा निष्पादित किया, जिसमें छह माह के भीतर संपूर्ण राशि लौटाने का वचन दिया गया था। निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद भी भुगतान नहीं किए जाने पर परिवादी ने अपनी रकम वापस मांगी। इसके बाद आरोपी ने केनरा बैंक, धमतरी शाखा स्थित अपने खाते से तीन लाख रुपये का चेक क्रमांक 228342 परिवादी को सौंपा।
परिवादी द्वारा उक्त चेक को आईसीआईसीआई बैंक, बालोद शाखा में भुगतान हेतु प्रस्तुत किया गया, किंतु आरोपी के खाते में पर्याप्त राशि उपलब्ध नहीं होने के कारण चेक अनादरित हो गया। चेक बाउंस होने के बाद परिवादी ने विधिक प्रक्रिया का पालन करते हुए आरोपी को 11 जुलाई तथा 26 जुलाई को पंजीकृत डाक के माध्यम से नोटिस भेजकर भुगतान की मांग की।
न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार एक नोटिस आरोपी के पते पर ताला बंद होने के कारण वापस लौट आया, जबकि दूसरे पते पर भेजा गया नोटिस आरोपी को विधिवत प्राप्त हुआ था। इसके बावजूद आरोपी ने निर्धारित वैधानिक अवधि के भीतर भुगतान नहीं किया, जिसके बाद परिवादी ने न्यायालय की शरण ली।
सुनवाई के दौरान आरोपी का परीक्षण दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत किया गया। आरोपी ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए आरोपों से इंकार किया, किंतु अपने बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। न्यायालय द्वारा पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद प्रतिरक्षा पक्ष की ओर से कोई दस्तावेज या साक्ष्य पेश नहीं किया गया।
मामले में प्रस्तुत दस्तावेजी साक्ष्यों, बैंक अभिलेखों, नोटिसों तथा अन्य तथ्यों का गहन परीक्षण करने के बाद न्यायालय ने पाया कि आरोपी के विरुद्ध परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत अपराध पूर्ण रूप से सिद्ध होता है। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि चेक का सम्मान वित्तीय लेन-देन की आधारशिला है तथा चेक अनादरण की घटनाएं बैंकिंग प्रणाली में आम नागरिकों के विश्वास को कमजोर करती हैं। इसलिए ऐसे मामलों में विधि द्वारा निर्धारित दंड का कठोरता से पालन आवश्यक है।
इन्हीं तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए न्यायालय ने आरोपी षडप्रकाश किरण कटेन्द्र को दोषसिद्ध घोषित करते हुए छह माह के साधारण कारावास की सजा सुनाई। मामले में परिवादी रोशनी सिंह की ओर से जिले के वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक सामटकर ने प्रभावी पैरवी करते हुए न्यायालय के समक्ष सशक्त पक्ष रखा, जिसके आधार पर न्यायालय ने दोषसिद्धि का निर्णय पारित किया।
क्या कहता है कानून?
परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के अनुसार यदि किसी व्यक्ति द्वारा जारी किया गया चेक खाते में पर्याप्त राशि न होने अथवा अन्य कारणों से अनादरित हो जाता है और वैधानिक नोटिस के बावजूद निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया जाता, तो संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है। दोष सिद्ध होने पर कारावास और आर्थिक दंड दोनों का प्रावधान है।




















