मामले में ग्राम लाटाबोड़ निवासी डमेंद्र कुमार गंजीर ने बालोद थाना, तहसीलदार और पंजीयन विभाग को शिकायत सौंपते हुए आरोप लगाया है कि उनकी कृषि भूमि का सौदा करने के लिए फर्जी ऋण पुस्तिका तैयार कर भूमाफियाओं का एक गिरोह सक्रिय है। उन्होंने पूरे मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

एक नंबर… दो ऋण पुस्तिकाएं… और अलग-अलग जमीन!
शिकायत के अनुसार सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मूल और कथित फर्जी दोनों ऋण पुस्तिकाओं का क्रमांक 4088086 है। लेकिन जब दस्तावेजों का मिलान किया गया तो कई गंभीर विसंगतियां सामने आईं।
मूल ऋण पुस्तिका में भूमि का खसरा नंबर 239/2 एवं 355/1 दर्ज है, जबकि कथित फर्जी ऋण पुस्तिका में 239/2 एवं 855/1 अंकित किया गया है।
यानी नंबर वही, लेकिन जमीन का विवरण बदल गया। सवाल यह है कि आखिर एक ही ऋण पुस्तिका क्रमांक पर दो अलग-अलग दस्तावेज कैसे अस्तित्व में आ गए? यदि शिकायतकर्ता के आरोप सही हैं तो यह सिर्फ दस्तावेजी गलती नहीं बल्कि सुनियोजित फर्जीवाड़े का मामला हो सकता है।
तहसीलदार की जगह नायब तहसीलदार की मुहर, बढ़ा संदेह
मामले में एक और अहम तथ्य सामने आया है। शिकायतकर्ता के अनुसार मूल ऋण पुस्तिका में तहसीलदार की सील और हस्ताक्षर अंकित हैं, जबकि कथित फर्जी दस्तावेज में नायब तहसीलदार की मुहर लगी हुई है।
एक ही क्रमांक की दो पुस्तिकाओं में अलग-अलग अधिकारी की सील होना भी जांच का विषय बन गया है। यही कारण है कि शिकायतकर्ता इसे सामान्य त्रुटि नहीं बल्कि दस्तावेज तैयार कर जमीन का सौदा करने की कोशिश बता रहे हैं।

फर्जी ऋण पुस्तिका तैयार करना गंभीर अपराध
राजस्व और कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी भूमि संबंधी दस्तावेज, ऋण पुस्तिका या राजस्व अभिलेख में कूटरचना (Forgery) कर उसे वास्तविक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करना गंभीर दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में धोखाधड़ी, जालसाजी और सरकारी अभिलेखों के दुरुपयोग से जुड़े प्रावधान लागू हो सकते हैं।
यदि जांच में यह साबित होता है कि जमीन के सौदे के लिए जानबूझकर फर्जी ऋण पुस्तिका तैयार की गई थी, तो संबंधित व्यक्तियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई संभव है।
खाता तीन लोगों का, दस्तावेज में अलग कहानी
शिकायतकर्ता ने अपने आवेदन में यह भी उल्लेख किया है कि वर्ष 2018 में संबंधित भूमि का खाता संयुक्त रूप से डमेंद्र कुमार गंजीर, वीरेंद्र गंजीर और बालाराम गंजीर के नाम पर था। बाद में सितंबर 2025 में विधिवत खाता विभाजन हुआ।
ऐसे में कथित तौर पर तैयार किए गए दस्तावेजों में दर्ज जानकारी और वास्तविक राजस्व रिकॉर्ड के बीच अंतर कई नए सवाल खड़े कर रहा है।
रजिस्ट्री रोकने और गिरोह की जांच की मांग
डमेंद्र कुमार गंजीर ने प्रशासन से मांग की है कि संबंधित खसरा नंबरों की किसी भी संभावित रजिस्ट्री पर तत्काल रोक लगाई जाए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह पता लगाया जाए कि फर्जी दस्तावेज किसने तैयार किए, किसके माध्यम से उनका उपयोग किया गया और इस कथित फर्जीवाड़े के पीछे कौन लोग शामिल हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल...
एक ही क्रमांक की दो ऋण पुस्तिकाएं… एक में तहसीलदार की मुहर, दूसरी में नायब तहसीलदार की… एक में खसरा नंबर 355/1, दूसरी में 855/1…
ऐसे में अब जांच एजेंसियों के सामने वही सवाल खड़ा है जो वर्षों पहले बॉलीवुड के उस गीत में पूछा गया था—”यहां हर चेहरे के पीछे एक चेहरा है… कौन है असली, कौन है नकली?”
प्रशासनिक जांच के बाद ही इस सवाल का जवाब सामने आएगा, लेकिन फिलहाल इस मामले ने जिले में भूमि रिकॉर्ड की सुरक्षा, दस्तावेजों की प्रामाणिकता और कथित भूमाफियाओं की गतिविधियों को लेकर बहस तेज कर दी है।




















