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राम नवमी विशेष:- छत्तीसगढ़ में भांजे का पैर क्यों छुआ जाता है.. .बालोद जिले के भोलापठार एवं सियादेही का क्या है पौराणिक मान्यता….बार बार इस मार्ग को” राम वन पथ गमन” में जोड़ने की शासन से क्यों हो रही अपील

बालोद, सनातन धर्म का महापर्व राम नवमी विश्व वंदितं मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जी का जन्मोत्सव मना रहा है।इस अवसर पर हमारा छत्तीसगढ़ प्रांत भी अछुता नहीं है।जैसा कि आप सभी भिज्ञ है इस तथ्य से कि भगवान श्री राम जी का छत्तीसगढ़ ननिहाल है। भगवान राम को जन्म देने वाली मां कौशिल्या अंबा का छत्तीसगढ़ मायका है ।रिश्ते में प्रभु राम हम छत्तीसगढ़ प्रांत वासियों के लिए भान्जे है और यही कारण है कि छत्तीसगढ़ राज्य में हर भांजा प्रभु राम सदृश मानकर पुजा जाता है।भारतीय वांग्मय गोस्वामी तुलसी दास कृत राम चरित मानस दर्शन में आज से साढ़े सत्रह लाख वर्ष पुर्व में त्रेतायुग में जन्मे मानस के महानायक भगवान श्री राम की लीला का संबंध छत्तीसगढ़ प्रांत के दण्डकारण्य के प्रारंभिक जिला बालोद भी अछुता नहीं है। पौराणिक कथा के अनुसार मानस वर्णन करती है:-
एक बार त्रेतायुग माहि,संभु गये कुंभज ऋषि पाही।
संग सती जगजननी भवानी,पुजे ऋषि अखिलेश्वर जानी।।
यथा भाव एक बार त्रेतायुग में भगवान शिव जी कुम्भज अर्थात अगस्त ऋषि के पास कैलाश से चलकर मां सती जगजननी भवानी जी को साथ लेकर आये। जिसे शिव आवा कहा गया कालान्तर में अपभ्रंश वाचन से सिव आवा आज सिहावा हो गया । कथा कहती ऋषि सम्मान को प्राप्त कर भगवान शिव जी ध्यान मग्न होकर कथा सुनते रहे परन्तु माता सती का मन कथा और कथा वाचक दोनों में भी नहीं लगा।परिणाम यह कि वापस कैलाश जाते दण्डक बन में प्रभु नर लीला का संवरण करते सीता अन्वेषण करते विरही के रूप में मृग ,पशु , पक्षी लता आदि को पुछते बालोद जिला के वन में नारागांव के समीप लीला संपादन करते देख भगवान शिव जी ने कहा:-
जय सच्चिदानंद जग पावन । अस कहि चलेउ मनोज नसावन।।
जय सच्चिदानंद प्रभु कहने पर मां सती को संसय हो गया और सती कहने लगी:-
ब्रम्ह जे व्यापक बिरज अज्,
अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरी होहि नर , जाहि न जात बेद।।
ये अपनी धर्मपत्नी को खोजने वाले कैसे भगवान ही सकते हैं।जब भगवान शिव जी ने देखा की सती संसय की कटिली झाड़ी में उलझ गयी है।
भगवान शिव ने कहा सती
जो तुम्हारे मन अति संदेहु,
तौ किन जाहि परीछा देहु।।
ऐसा कहकर शिव जी सती को परीक्षा लेने भेज कर समीप के पहाड़ी नुमा पठार में ” बैठि बट छाही” और जिस पठार में भोले बाबाजी बैठे वह भोला पठार कहलाया जो आज भी पर्रेगुड़ा (करहीभदर)में स्थित है।और परीक्षा लेने सती ने नारागांव के पास जिस जगह राम चरित मानस के अनुसार ” धरी सीता कर देह।।”अर्थात जिस स्थान पर सती ने ” सिया का देह ” धारण किया वह “सिया देही” कहलाया। इस प्रकार रामायण कालीन गाथा से संबद्ध हमारे बालोद जिले में दो मंदिर “भोला पठार” पर्रेगुड़ा (करहीभदर)और “सियादेही”नारागांव आज भी पौराणिक गाथा को समेटे इंतजार रत है अपने वैभव को प्राप्त करने।इस विषय पर लेखक ने पुरजोर शासन से मांग की है कि क्यों न इस दोनों पौराणिक स्थलों को ” राम वन पथ गमन” से जोड़ कर विकसित किया जाए और बालोद जिला वासियों को गौरवान्वित होने का अवसर दिया जाय।
लेखक
पुरुषोत्तम सिंह राजपूत “मानस मणि”
प्रांतीय महासचिव
तुलसी मानस प्रतिष्ठान छत्तीसगढ़ प्रांत
टीप:-लेखक ने ये सारे तथ्य अपने मार्गदर्शक सद्गुरु ब्रह्म लीन वेदान्त केशरी स्वामी आत्मा राम कुम्भज जी के प्रवचन से संजोया है।

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