बालोद/ दल्लीराजहरा,, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र विकासखंड डौंडी दल्ली राजहरा के समीप बिटाल सहित आसपास के ग्रामीण इलाकों के जंगलों में मुर्गा लड़ाई का खेल जोरों से चल रहा है और इस खेल में हजारों लाखों रुपए का सट्टा खेला जा रहा है हालांकि स्थानीय थाना प्रभारी वीणा यादव ने बताया कि अगर नियमों के विरुद्ध मुर्गा लड़ाई की आड़ में सट्टा खेला जा रहा होगा तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों का कथन है कि या प्राचीन परंपरा चली आई है और उसी परंपरा के अनुरूप मुर्गा लड़ाई का खेल खेला जाता है दांवपेच लगाया जाता है इसे सट्टे का रूप और नाम दिया जाना पूरी तरह अनुचित होगा, दल्लीराजहरा सहित डौंडी ब्लाक के आदिवासी ब्लॉक के विभिन्न जंगलों में सप्ताहिक बाजार के दिन यह खेल चलता है हजारों की संख्या में ग्रामवासी खट्टे होते हैं और अपने -अपने मुर्गे मैदान में छोड़ते हैं,
कैसे तैयार किए जाते हैं लड़ाई के लिए मुर्गे
मुर्गा लड़ाई के शौकीनों की प्रतिष्ठा मुर्गे से जुड़ी होती है, लिहाज उसे बड़े जतन से पाला जाता है। मुर्गे के मालिक अपने परिवार से कहीं ज्यादा मुर्गे का ख्याल रखते हैं। वे मुर्गे को जंगलों में मिलने वाली जड़ी बूटियां खिलाते हैं, जिससे उसकी स्फूर्ति और वार करने की क्षमता बढ़ जाती है। मुर्गे को हिंसक बनाने के लिए गौर (बायसन) का पित्त भी खिलाया जाता है।
डौंडी ब्लाक क्षेत्र में साप्ताहिक बाजार के एक हिस्से में गोल घेरा बनाकर मुर्गों की लड़ाई कराई जाती है। यहां इलाके के दूर-दूर के गांवों से लोग विशेष रूप से ट्रेंड किए गए मुर्गे लेकर पहुंचते हैं। लड़ाई शुरू होने से पहले मुर्गे के पैर में धागे की मदद से छुरी बांध देते हैं। इस छुरी से मुर्गा प्रतिद्वंदी पर वार करता है, प्रतिद्वंदी मुर्गे की मौत के बाद ही खेल खत्म माना जाता है। पुराने समय में लड़ाई जीतने के लिए मुर्गे के शरीर में सियार की चर्बी का लेप लगा दिया जाता था, जिसकी बदबू से प्रतिद्वंदी मुर्गा मैदान छोड़कर भाग जाता था।,,,
स्टेरॉयड भी दिए जाते हैं
प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से मुर्गे की ताकत बढ़ाने के अलावा मुर्गों को स्टेरायड जैसी दवाएं भी दी जाती हैं। इसके लिए ग्रामीण अवैध तरीके से डेक्सामेथासोन, बीटा मैथासोन क इंजेक्शन और प्रेडनीसोल की गोलियां मुर्गे को खिलाते हैं। ये दवाएं आसानी से मिल जाती हैं और मुर्गों पर इनका असर बेहद तेजी से होता है। इन दवाओं का नशा इतना तेज होता है कि लड़ते वक्त गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी मुर्गा मैदान नहीं छोड़ता।
असील प्रजाति का मुर्गा है सबसे खास
इस खेल में सबसे ज्यादा असील प्रजाति के मुर्गों को लड़ाया जाता है जिसका नाम है गेलस डोमेस्टिकस। इस मुर्गे की नजर शार्प और टांगे लंबी होती हैं जो लड़ाई में काफी सहायक होती है। लाखों का होता है हर दांव मुर्गा लड़ाई में एक हजार से 50 हजार रुपये तक का दांव तो लड़ाने वाले ही लगाते हैं। इससे कई गुना ज्यादा रकम लड़ाई देखने वाले दर्शक लगाते हैं। आम दिनों में एक-एक दांव जहां एक-दो लाख के होते हैं वहीं त्योहारी सीजन में बोली बढ़कर 5 से 10 लाख भी चली जाती है
ग्रामीण क्षेत्र में लगने वाले लगभग सभी मेले में इन दिनों मुर्गा लड़ाई का क्रेज बढ़ गया है मुर्गे की लड़ाई देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग गांव में लगने वाले मेले में पहुंचते हैं। एक-एक मुर्गे पर लोग 50 रुपए से लेकर 25 हजार रुपये तक के दांव लगाते हैं। इस खेल में शामिल होने के लिए अब शहर के लोग भी मेले में पहुंचकर पैसा दांव पर लगा रहे हैं। डौडी ब्लाक क्षेत्र में संस्कृति में अब यह मनोरंजन का खेल बाजारों में जुए का खेल बन गया है। मुर्गा लड़ाई की संस्कृति अब धीरे-धीरे सट्टे में बदल गयी है जिसे रोक पाना पुलिस प्रशासन के लिए संभव नही है। ,,
डौडी ब्लाक में इन दिनों मेलों में होने वाले मुर्गा लड़ाई वाले स्थान पर पैर रखने तक की जगह नहीं होती है। मुर्गा लड़ाई देखने वाला हर अदना व्यक्ति भी दस बीस रुपए से लेकर 5 से 10 हजार रुपये तक दांव लगाता है। एक-एक राउंड में लाखों के रुपये के दांव लगने लगे हैं। लड़ाकू मुर्गे के पैर में काती बांधकर इसके विशेषज्ञ निर्धारित बाड़े के अंदर मुर्गा लड़वाते हैं।
मुर्गा के पैरों में चाकू बंधे हैं और उनकी पैंतरेबाजी पहलवानों जैसी प्रतीत होती है। बिजली की चमक जैसी तेजी से वे अपने दावं बदलते हैं और एक-दूसरे पर वार करते हैं। लड़ाई में जीतने वाला मुर्गे का मालिक हारे हुए व्यक्ति का मुर्गा लेकर शान से गांव वापस लौटता है। लड़ाई में मुर्गा जीतने पर कांतकार को खुशी से 300 से 400 रुपये तक मुर्गा मालिक देते हैं। मुर्गा लड़ाई में कांतकार को सेनापति माना जाता है। जिसके नेतृत्व में मुर्गा बाड़े में लड़ाई लड़ता है। उसके पैर में बंधे चाकू की कलाबाजी कांतकार ही जानते हैं। विजेता मुर्गे का स्वामी मेले में फक्र से घूमता है और अपने गांव वालों के साथ जीत का जश्न मनाता है । मुर्गा लड़ाई के शौकीनों की प्रतिष्ठा मुर्गे से जुड़ी होती है, लिहाजा उसे बड़े जतन से पाला जाता है। मुर्गे के मालिक अपने परिवार से कहीं ज्यादा मुर्गे का ख्याल रखते हैं। वे मुर्गे को जंगलों में मिलने वाली जड़ी बूटियां खिलाते हैं जिससे उसकी स्फूर्ति और वार करने की क्षमता बढ़ जाती है। मुर्गे को हिसक बनाने के लिए कई प्रकार के पहाड़ी कन्द मूल भी खिलाया जाता है।,,
ग्राम बिटाल के पूर्व सरपंच और जनप्रतिनिधि शंकरलाल गावड़े कहते हैं कि मुर्गा लड़ाई आदिवासियों का प्राचीन खेल है इसे सट्टा के रूप में कहना या प्रचलित करना उचित नहीं होगा यह सिर्फ मनोरंजन और संस्कृति के लिए खेला जाता है,
दल्ली राजहरा थाना प्रभारी वीणा यादव कहती हैं कि अगर मुर्गा लड़ाई के नाम पर सट्टा का खेल चल रहा होगा तो अवश्य रूप से कड़ी कार्रवाई की जाएगी शासन के नियमों के अनुरूप ही कार्य किया जाना चाहिए ग्रामीणों को,