
कमरछठ की परंपरा के अनुसार महिलाओं ने सगरी का निर्माण कर उसे फूलों, कांसी, महुआ, लाई, पसहर चावल, छह प्रकार की भाजियों और अन्य पूजन सामग्री से सजाया। कई स्थानों पर सगरी में मिट्टी की नाव भी बनाई गई। पंडितों की अगुवाई में महिलाओं ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच गौरी-गणेश, भगवान शिव-पार्वती, वरुण देवता और मां हलषष्ठी का पूजन किया। इसके बाद सामूहिक रूप से कमरछठ की पौराणिक कथा का श्रवण किया गया। कई पूजा स्थलों पर भजन-कीर्तन की व्यवस्था भी रही, जिससे वातावरण देर तक भक्तिमय बना रहा।
मोहल्लों में भी हुई सामूहिक पूजा
शहर के विभिन्न वार्डों और मोहल्लों में महिलाओं ने सामूहिक रूप से कमरछठ की पूजा की। जहां मंदिर या निर्धारित सगरी स्थल की सुविधा नहीं थी, वहां महिलाओं ने घरों के आसपास गड्ढा खोदकर सगरी तैयार की और आसपास की महिलाओं के साथ मिलकर पूजा-अर्चना की। वार्ड क्रमांक 19 में भी बड़ी संख्या में महिलाओं ने सामूहिक पूजा में हिस्सा लिया। यहां श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए टेंट, छाया, पेयजल, बैठने और पूजन सामग्री की व्यवस्था की गई थी। पार्षद श्यामा यादव सहित स्थानीय लोगों के सहयोग से हुई व्यवस्था के बीच महिलाओं ने शांतिपूर्वक पूजा संपन्न की।

बच्चों की पीठ पर पोती मारकर मांगी लंबी उम्र
कमरछठ की पूजा के बाद माताओं ने अपने बच्चों की पीठ पर पीली पोती मारकर उनके दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना की। संतान की मंगलकामना से जुड़ी इस परंपरा में मातृत्व की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी। पूजा स्थलों पर बच्चों के साथ पहुंची महिलाओं ने पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ पर्व मनाया।
पसहर चावल और छह भाजी का रहा विशेष महत्व
दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद महिलाओं ने सूर्यास्त के पश्चात पसहर चावल, छह प्रकार की भाजी और दही का सेवन कर व्रत खोला। कमरछठ में पसहर चावल का विशेष महत्व माना जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन हल से उपजे अनाज का सेवन नहीं किया जाता। छत्तीसगढ़ की लोकपरंपरा में महिलाएं हल चली जमीन पर पैर रखने और हल से उपजे अनाज को ग्रहण करने से भी परहेज करती हैं। इसी तरह गाय के दूध, दही और घी के स्थान पर भैंस के दूध, दही और घी के सेवन की परंपरा भी है।

भगवान बलराम के जन्म से जुड़ी है मान्यता
हलषष्ठी पर्व को भगवान बलराम के जन्म से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान बलराम का जन्म इसी तिथि को हुआ था, जबकि इसके दो दिन बाद जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। भगवान बलराम का प्रमुख अस्त्र हल माना जाता है, इसलिए इस पर्व को हलषष्ठी कहा जाता है। वहीं कुछ धार्मिक मान्यताओं में भगवान कार्तिकेय के जन्म का संबंध भी इसी तिथि से जोड़ा जाता है।
कमरछठ का यह पर्व बालोद में केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि महिलाओं की सामूहिक भागीदारी, पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोक आस्था का जीवंत स्वरूप भी दिखाई दिया। सुबह से शुरू हुआ व्रत और पूजा-अर्चना का सिलसिला शाम तक चलता रहा तथा पूरे शहर में पर्व को लेकर श्रद्धा और उत्साह का वातावरण बना रहा।













