1985 से है वैध कब्जा
मामला डौंडीलोहारा स्थित आबादी भूमि के खसरा नंबर 520 के एक हिस्से से जुड़ा है। रामकिशोरी गुप्ता का कहना है कि उन्हें वर्ष 1985 में तत्कालीन मध्यप्रदेश शासन द्वारा आबादी पट्टा प्रदान किया गया था, जिसके आधार पर उन्होंने मकान का निर्माण कर तब से लगातार वहीं निवास किया है। विवाद उनके मकान के समीप स्थित तहसील कार्यालय जाने वाले मुख्य मार्ग को लेकर उत्पन्न हुआ।

बार-बार आपत्तियां लगाने का आरोप
पीड़ित पक्ष के अनुसार, रिखबचंद संचेती ने संबंधित भूमि को विवादित बताते हुए विभिन्न विभागों और राजस्व न्यायालयों में लगातार आवेदन प्रस्तुत किए। परिवार का आरोप है कि तथ्यों को छिपाकर तथा दस्तावेजों में कथित कूटरचना के माध्यम से प्रशासन और न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किया गया, जिससे उन्हें वर्षों तक मानसिक और प्रशासनिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
तहसीलदार के आदेश की प्रमुख बातें
तहसीलदार न्यायालय ने अपने आदेश में माना कि रामकिशोरी गुप्ता वर्ष 1985 से शासन द्वारा प्रदत्त वैध आबादी पट्टे के आधार पर संबंधित भूमि पर कब्जे में हैं। न्यायालय ने यह भी पाया कि भूमि पर उनका मकान और कब्जा लंबे समय से स्थापित है। वहीं, रिखबचंद संचेती अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त और विश्वसनीय दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके। इन तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने उनका आवेदन खारिज कर दिया।
उच्च न्यायालय के पुराने निर्णय का भी उल्लेख
परिवार का कहना है कि तहसील कार्यालय जाने वाले मार्ग से जुड़े मांगभूमि विवाद में उच्च न्यायालय लगभग 20 वर्ष पहले ही रिखबचंद संचेती के दावे को खारिज कर चुका था। इसके बावजूद विभिन्न स्तरों पर लगातार आवेदन देकर विवाद को बनाए रखा गया।

प्रधानमंत्री आवास योजना में भी बाधा का आरोप
रामकिशोरी गुप्ता के परिवार का आरोप है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत स्वीकृत मकान के निर्माण में भी रिखबचंद संचेती द्वारा लगातार आपत्तियां दर्ज कराकर बाधाएं उत्पन्न करने का प्रयास किया गया। परिवार का कहना है कि उनके पास वर्ष 1985 का वैध आबादी पट्टा तथा वर्ष 2001-02 में ग्राम पंचायत द्वारा जारी भूमि अधिकार पत्र भी उपलब्ध है।
परिवार ने जताई राहत
तहसीलदार न्यायालय का निर्णय आने के बाद रामकिशोरी गुप्ता और उनके परिवार ने खुशी जताते हुए कहा कि वर्षों से चले आ रहे विवाद के समाप्त होने से उन्हें बड़ी राहत मिली है।
“मेरे खिलाफ लगातार शिकायतें और कार्रवाई कराकर मुझे वर्षों तक प्रताड़ित किया गया। तहसीलदार न्यायालय के फैसले से मुझे न्याय मिला है और सत्य की जीत हुई है।”
— रामकिशोरी गुप्ता




















