बालोद- छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पर्वों में से एक पर्व कमरछठ बालोद जिले में बुधवार को मनाया जाएगा। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र एवं सुख-समृद्धि के लिए हलषष्ठी माता की पूजा-अर्चना करेंगी। अन्य प्रदेशों में हलषष्ठी पर्व को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ के जन्मोत्सव के रूप में मनाने की परंपरा है। षष्ठी, छठ माता की पूजा-अर्चना में पसहर चावल और छह प्रकार की भाजियों का भोग लगाया जाता है।
160 रुपये किलो बिका पसहर चावल
कमरछठ पूजा में पसहर चावल का भोग लगाने की मान्यता के चलते चावल मंगलवार को महंगे दामों में बिका। अलग-अलग जगहों पर महिलाओं को 150 से 160 रुपये किलो में चावल खरीदा। शहर के बुधवारी बाजार,पुराना बाजार,जय स्तंभ चौक सहित अन्य इलाके में सड़क किनारे पसरा लगाकर महिलाए पसहर चावल दोगुनी-तिगुनी कीमत में बेचा गया।
बिना हल जोते उगता है पसहर चावल
पसहर चावल को खेतों में उगाया नहीं जाता। यह चावल बिना हल जोते अपने आप खेतों की मेड़, तालाब, पोखर या अन्य जगहों पर उगता है। भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ के जन्मोत्सव वाले दिन हलषष्ठी मनाए जाने के कारण बलदाऊ के शस्त्र हल को महत्व देने के लिए बिना हल चलाए उगने वाले पसहर चावल का पूजा में इस्तेमाल किया जाता है। पूजा के दौरान महिलाएं पसहर चावल को पकाकर भोग लगाती हैं, साथ ही इसी चावल का सेवन कर व्रत तोड़ती हैं।अन्य पूजन सामग्री का भी महत्वः फूल, नारियल, फुलोरी, महुआ, दोना, टोकनी, लाई, छह प्रकार की भाजी का भी पूजा में महत्व है।
यह है पौराणिक कथा
व्रत की पौराणिक कथा यह है कि वासुदेव-देवकी के छह पुत्रों को कंस ने कारावास में मार डाला। जब सातवें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आया तो देवर्षि नारद ने देवकी को हलषष्ठी देवी का व्रत रखने की सलाह दी। देवकी ने इस व्रत को सबसे पहले किया, जिसके प्रभाव से उनके आने वाले संतान की रक्षा हुई। हलषष्ठी का पर्व भगवान कृष्ण व बलराम से संबधित है।