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मिट्टी के बैलों से सजेगा बालोद का बाजार, गुरुवार को गूंजेगी पोला की आस्था; बैलों के श्रृंगार से लेकर ठेठरी-खुरमी तक दिखेगी छत्तीसगढ़ी परंपरा

बालोद। खेती-किसानी और पशुधन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने वाला पारंपरिक पोला पर्व गुरुवार को जिलेभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। ग्रामीण अंचलों में इस पर्व को लेकर विशेष तैयारियां शुरू हो गई हैं। किसान अपने बैलों को स्नान कराकर उनका श्रृंगार करेंगे और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर उन्हें सम्मान देंगे। वहीं घरों में छत्तीसगढ़ी पकवानों की खुशबू बिखरेगी और बच्चे मिट्टी से बने बैल तथा पारंपरिक खिलौनों के साथ पोला मनाएंगे।

पोला पर्व के मद्देनजर बालोद शहर के बाजारों में भी रौनक बढ़ गई है। विभिन्न चौक-चौराहों पर मिट्टी से बने रंग-बिरंगे बैलों के जोड़े और पारंपरिक मिट्टी के खिलौनों की दुकानें सज गई हैं। मिट्टी से बने पोला, बैल जोड़ी के अलावा चूल्हा, मटका, कड़ाही, गंजी सहित कई तरह के छोटे-छोटे बर्तन बच्चों को आकर्षित कर रहे हैं। बाजार में मिट्टी का पोला करीब 30 से 40 रुपये, बैल की जोड़ी 50 से 60 रुपये और अन्य खिलौने 10 से 15 रुपये तक में उपलब्ध हैं।

बैलों के श्रृंगार के बाद होगी पूजा-अर्चना

पोला पर्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष किसान और उसके बैल के बीच का आत्मीय संबंध है। कृषि प्रधान बालोद जिले में खेती के काम में बैल और अन्य पशुधन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी योगदान के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए पोला के दिन बैलों को काम से विश्राम दिया जाता है।

किसान बैलों को स्नान कराकर उनके सींगों पर रंग लगाते हैं और शरीर का श्रृंगार करते हैं। गले में घुंघरू, घंटी, कौड़ी तथा अन्य पारंपरिक आभूषण पहनाकर उनकी पूजा की जाती है। कृषि औजारों की भी साफ-सफाई और पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद बैलों को विशेष रूप से तैयार किया गया भोजन कराया जाता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में इस अवसर पर बैल दौड़ और अन्य पारंपरिक आयोजन भी किए जाते हैं।

मिट्टी के खिलौनों का बाजार, बच्चों में खास उत्साह

पोला पर्व में मिट्टी से बने खिलौनों की अपनी अलग ही परंपरा है। बच्चों के लिए छोटे आकार के चूल्हे, हांडी, मटका, कड़ाही, गंजी, टीन, जाता, सील-लोढ़ा सहित विभिन्न पारंपरिक बर्तन तैयार किए जाते हैं। मिट्टी के इन खिलौनों के माध्यम से बच्चों को ग्रामीण जीवन और छत्तीसगढ़ी संस्कृति से जोड़ने की परंपरा आज भी कायम है।

पोला के अवसर पर मिट्टी से बने नंदी बैल भी विशेष रूप से खरीदे जाते हैं। पूजा-अर्चना के बाद बच्चे इन खिलौनों से खेलते हैं। कई ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी के बैल देवी-देवताओं को अर्पित करने की भी परंपरा है।

देवी-देवताओं को चढ़ाए जाएंगे मिट्टी के बैल

पोला पर्व केवल घरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गांव की सामुदायिक आस्था से भी जुड़ा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में शीतला देवी सहित भैसासुर, ठाकुर देवता, साड़हा देवता और सियार देवता जैसे स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान मिट्टी से बने नंदी बैल चढ़ाने की परंपरा भी निभाई जाती है।

ग्रामीण परिवार इस दिन अपने घर और आंगन की साफ-सफाई कर पूजा की तैयारी करते हैं। महिलाएं पारंपरिक पकवान तैयार करती हैं, जबकि किसान बैलों और कृषि उपकरणों की पूजा कर अच्छी फसल तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

ठेठरी-खुरमी की खुशबू से महकेंगे घर

पोला पर्व पर छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का भी विशेष महत्व है। घरों में ठेठरी, खुरमी, गुड़-चीला, गुलगुल भजिया, गुड़हा, अनरसा, सोहारी, चौसेला, बरा, मुरकू, भजिया और मूठिया जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाएंगे। पूजा-अर्चना के बाद इन व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा और परिवार के सदस्य मिलकर पर्व की खुशियां साझा करेंगे।

भादो अमावस्या को मनाया जाता है पोला

पोला पर्व भाद्रपद माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व मूल रूप से खेती-किसानी, पशुधन और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना से जुड़ा हुआ है। किसान मानते हैं कि जिस बैल और गौवंश ने वर्षभर खेती के काम में उनका साथ दिया, उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का यह विशेष अवसर है। इसलिए पोला के दिन बैलों से किसी भी प्रकार का काम नहीं कराया जाता और उन्हें पूरा विश्राम दिया जाता है।

पोलासुर वध से जुड़ी है धार्मिक मान्यता

पोला पर्व को लेकर धार्मिक मान्यता भी प्रचलित है। मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के बाल्यकाल में मथुरा के राजा कंस ने उन्हें मारने के लिए कई असुरों को भेजा था। इसी क्रम में कंस ने पोलासुर नामक राक्षस को भेजा। भगवान कृष्ण ने उसका वध कर दिया। कहा जाता है कि यह घटना भाद्रपद अमावस्या के दिन हुई थी। इसी मान्यता के चलते इस दिन को पोला पर्व के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है।

पोला पर्व इस तरह बालोद में केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि किसान, बैल, धरती और अन्न के बीच सदियों पुराने रिश्ते को सम्मान देने वाला लोकपर्व है। आधुनिकता के दौर में भी मिट्टी के बैल, पारंपरिक खिलौने, ग्रामीण पूजा-पद्धति और छत्तीसगढ़ी पकवान इस पर्व की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं।

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