‘आज के पसीने की एक बूंद कल का मोती’, गुरु-शिष्य का मन जुड़ जाए तो महक उठता है जीवन
अक्षयमुनिश्री के प्रवचन से धर्मसभा में गूंजा साधना और संयम का संदेश, नन्हीं बालिकाओं ने तपस्या से बढ़ाया धर्मभाव का गौरव
बालोद। समता भवन बालोद में चल रहे चातुर्मास के दौरान शनिवार को आयोजित धर्मसभा में शासन दीपक श्री अक्षयमुनि जी मसा ने गुरु-शिष्य संबंध, आत्मसाधना, कर्मों की गहन गति और सादगीपूर्ण जीवन के महत्व पर प्रेरक प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि “आज के पसीने की एक बूंद कल का मोती है।” मनुष्य को वर्तमान जीवन में किए गए पुरुषार्थ, संयम और साधना का फल निश्चित रूप से प्राप्त होता है। धर्मसभा में विशेष आकर्षण नन्हीं बालिकाओं की तपस्या रही, जिन्होंने कम उम्र में उपवास का संकल्प लेकर साधना और संस्कार का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
मुनिश्री ने कहा कि सद्गुरु का सानिध्य मिलना जीवन का अनमोल सौभाग्य है। जिस प्रकार माली के सानिध्य से सूखा बगीचा भी हरा-भरा और सुंदर बन जाता है, उसी प्रकार गुरु के मार्गदर्शन से शिष्य का जीवन भी संस्कार, साधना और आत्मचेतना से खिल उठता है। गुरु और शिष्य के बीच मन का तार जुड़ जाए तो जीवन महकने लगता है। उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य का संबंध केवल बाहरी नहीं, बल्कि आत्मगत संबंध है। गुरु बिना किसी स्वार्थ और शर्त के ज्ञान प्रदान करता है और शिष्य को उस ज्ञान को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने आचारांग सूत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु के पास शिष्य वाचना ग्रहण करता है तो उसके जीवन को दिशा मिलती है। मनुष्य यदि महापुरुषों और ज्ञानियों की बातों को आत्मसात नहीं करता तो वह संसार के मोह-माया रूपी दलदल में उलझता चला जाता है। कुदरत के बंधनों में फंसा मनुष्य पराधीनता का अनुभव करता है, जबकि साधना उसे भीतर से स्वतंत्र और जागृत बनाती है।
संसाधन बढ़े, फिर भी मनुष्य बेचैन
मुनिश्री ने आधुनिक जीवनशैली पर चिंतन करते हुए कहा कि आज इंसान के पास पहले से कहीं अधिक साधन और सुविधाएं हैं, फिर भी उसके भीतर निरंतर बोरियत और बेचैनी बनी हुई है। दूसरी ओर संतों के पास भौतिक साधन सीमित होते हैं, लेकिन वे आत्मसाधना में निरंतर लीन रहते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर ने बिना आधुनिक संसाधनों के भी जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान आत्मज्ञान और साधना के माध्यम से बताया।
उन्होंने कर्म सिद्धांत की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि मनुष्य इस जन्म में बुद्धि और चतुराई का कितना भी खेल कर ले, लेकिन कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है। गीता में भी कर्मों की गहन गति का उल्लेख मिलता है। इसलिए मनुष्य को धन और भौतिक उपलब्धियों के पीछे जीवन का पूरा समय लगाने के बजाय अपने कर्मों और चेतना को निर्मल बनाने का प्रयास करना चाहिए।
मुनिश्री ने महात्मा गांधी के सादा जीवन और उच्च विचार का उदाहरण देते हुए कहा कि जीवन में अहंकार को स्थान नहीं मिलना चाहिए। करुणा, दया, शील, नम्रता और सरलता को जीवन का हिस्सा बनाना ही वास्तविक धर्म है। उन्होंने कहा कि चेतना को जगाने की आवश्यकता है, क्योंकि धन के लोभ में मनुष्य कई बार अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा देता है। पक्षी प्रकृति के साथ सहज जीवन जीते हैं, लेकिन मनुष्य धन की दौड़ में अपना बहुमूल्य समय गंवा रहा है।

नन्हीं बालिकाओं की तपस्या बनी धर्मसभा का विशेष आकर्षण
चातुर्मास में जैन संत श्री अक्षयमुनिजी मसा की प्रेरणा से श्रद्धालुओं द्वारा निरंतर त्याग, तपस्या और साधना की जा रही है। अब तक 6 मासक्षमण पूर्ण हो चुके हैं। इसी क्रम में शनिवार को कुसुम सौरभ नाहटा ने 21 उपवास तप का संकल्प लिया।
वहीं धर्मसभा में नन्हीं बालिकाओं की तपस्या ने विशेष रूप से सभी का ध्यान आकर्षित किया। वर्णिका लोढ़ा ने 5 उपवास, जबकि सोनाक्षी और यशी लोढ़ा ने 4-4 उपवास तपस्या का संकल्प जैन मुनिश्री से ग्रहण किया। इतनी कम उम्र में बालिकाओं द्वारा तप, संयम और त्याग का संकल्प लेना धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणादायी और भावुक कर देने वाला क्षण रहा। इन बालिकाओं की तपस्या ने यह संदेश दिया कि धर्म और संस्कार की नींव बचपन से ही मजबूत की जाए तो आने वाली पीढ़ी आध्यात्मिक मूल्यों से समृद्ध हो सकती है।
मुनिश्री ने कहा कि “जैसा पढ़ोगे पुस्तक, वैसा रहेगा मस्तक; जैसा खाओगे आचार, वैसा रहेगा विचार और जैसा पियोगे पानी, वैसी रहेगी वाणी।” उन्होंने व्यक्ति को अपने आहार, विचार, व्यवहार और संस्कारों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि ऋषि सत्य का दर्शन करता है, जबकि कवि कई बार कल्पनाओं में खो जाता है। इसलिए जीवन में सत्य, साधना और आत्मचिंतन का महत्व समझना चाहिए।
8 सितंबर से शुरू होगा पर्यूषण पर्व
जैन धर्म का पावन पर्यूषण पर्व 8 सितंबर से प्रारंभ होने जा रहा है। चातुर्मास के इस आध्यात्मिक वातावरण में त्याग, तपस्या, स्वाध्याय और आत्मचिंतन की गतिविधियां निरंतर जारी हैं। धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने मुनिश्री के प्रवचनों से प्रेरणा लेते हुए धर्म, संयम और सदाचार को जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।













