30 उपवास की तपस्या पूर्ण करने पर नमिता नाहटा का जैन समाज ने किया अभिनंदन
बालोद। जैन समाज की तपस्या परंपरा के अंतर्गत तपस्वी रत्न नमिता नाहटा ने 30 उपवास की कठिन तपस्या पूर्ण की। इस अवसर पर जैन समाज के विभिन्न संगठनों और पारिवारिकजनों ने उनकी तपस्या का अभिनंदन किया। चातुर्मास के दौरान जैन संत अक्षय मुनि की प्रेरणा से अब तक पांच मासक्षमण तपस्याएं भी पूर्ण हो चुकी हैं।
समता भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए अक्षय मुनि ने कहा कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके बाहरी ज्ञान या सामाजिक प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार और आंतरिक गुणों से होती है। इंसान के व्यक्तित्व में ठंडा दिमाग, गर्म खून, कोमल हृदय और प्रखर पुरुषार्थ होना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल शब्दों और धारणाओं को समझ लेना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि शब्दों का अर्थ डिक्शनरी में मिल सकता है, लेकिन जीवन का अर्थ आत्मबोध से ही समझा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि अनादि काल से मनुष्य संसार की उलझनों में फंसा हुआ है। उलझनें बढ़ती हैं तो व्यक्ति हिंसा की ओर चला जाता है और फिर उसी हिंसा में समाधान तलाशने लगता है, जबकि हिंसा से समाधान संभव नहीं है। धर्म का मार्ग विचारों को बढ़ाने के बजाय जागरूकता और ध्यान का मार्ग है। आज मनुष्य लगातार जानकारी जुटाने में लगा है, लेकिन आत्मबोध से दूर होता जा रहा है। जब व्यक्ति स्वयं को जानने लगता है तो विचारों का बोझ कम होता है और समस्याओं का प्रभाव भी समाप्त होने लगता है।
अक्षय मुनि ने कहा कि आज मनुष्य औपचारिकताएं पूरी करने में ही अपनी अनमोल जिंदगी गंवा रहा है। ज्ञानी होने का भ्रम व्यक्ति को आत्मबोध से दूर कर देता है। संसार हमें वैसा ही दिखाई देता है, जैसी धारणाएं हम अपने भीतर बना लेते हैं। इसलिए जीवन में केवल ज्ञान एकत्र करने के बजाय उसे अनुभव करने और आत्मचिंतन की आवश्यकता है।
उन्होंने अहंकार पर कहा कि हर व्यक्ति ‘मैं’ और ‘मेरे’ की भावना में जी रहा है। धर्म के क्षेत्र में भी यही स्थिति दिखाई देती है। व्यक्ति जहां अपने अहंकार को संतुष्ट होते देखता है, वहीं टिक जाता है। उन्होंने कहा कि इंसान के भीतर सरलता और कोमलता होगी तो उसे अपनी पहचान बताने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ेगी।

भगवान कृष्ण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कृष्ण ने प्रेम की बांसुरी बजाई, लेकिन हम गीता पढ़ने के बावजूद कृष्ण के जीवन और उनके संदेश को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। अनेक टीकाएं लिखी गईं, लेकिन आवश्यकता कृष्ण को समझने की है। उन्होंने कहा कि जीवन को कभी बाजार की कीमत से नहीं आंकना चाहिए। भगवान महावीर का जीवन विराट था और उन्होंने जीवन को उसके स्वभाव के अनुरूप बहने दिया।
भगवान राम के वनवास का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि राम ने वनवास को जीवन का एक हिस्सा माना और कैकई को कभी दोष नहीं दिया। जीवन में परिस्थितियां आती-जाती रहती हैं, इसलिए किसी भी कार्य को केवल मजबूरी में नहीं, बल्कि आनंदपूर्वक करना चाहिए।
धर्मसभा में उन्होंने कहा कि सामान्य व्यक्ति परिस्थितियों की समीक्षा करता है, जबकि जागृत व्यक्ति परिस्थितियों से ऊपर उठकर उन्हें देखता है। भगवान महावीर के कानों में खीले ठोके जाने जैसी कठोर परिस्थितियों में भी उनकी जागरूकता बनी रही। उन्होंने कहा कि गंदगी बाहर से अधिक हमारी नजरों और सोच में होती है। मनुष्य की दृष्टि और विचार शुद्ध होंगे तो उसे हर परिस्थिति में सकारात्मकता दिखाई देगी।
उन्होंने संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि संस्कृति का नाश नहीं होना चाहिए और आर्य संस्कृति की रक्षा के लिए समाज को सजग रहना चाहिए। गाय को जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग बताते हुए उन्होंने गौशालाओं तथा पेड़-पौधों की रक्षा के लिए जिम्मेदारीपूर्वक कार्य करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जीवन केवल लंबा नहीं, बल्कि गहरा और सार्थक होना चाहिए।
चातुर्मास में तपस्या की कड़ी आगे बढ़ाते हुए नमिता तरुण नाहटा ने 30, ईषा नेहा तातेड ने 29, कुसुम सौरभ नाहटा ने 17 और अमित भंसाली डौंडीलोहारा ने 8 उपवास की तपस्या का संकल्प ग्रहण किया। इससे पूर्व काजल नाहर, शर्मिला बाफना, प्रिया श्रीश्रीमाल, स्नेहल लोढ़ा और नमिता नाहटा की मासक्षमण तपस्याएं पूर्ण हो चुकी हैं।













