जेएनसीएएसआर के वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि, स्कैंडियम नाइट्राइड की पतली फिल्म ने बदली स्थापित धारणा; अति संवेदनशील तापमान और फोटॉन सेंसरों की नई राह खुली
बेंगलुरु। भारतीय वैज्ञानिकों ने ठोस पदार्थों में तापमान के अंतर को विद्युत वोल्टेज में बदलने की क्षमता को लेकर चली आ रही करीब एक सदी पुरानी सीमा को चुनौती देते हुए विज्ञान की दुनिया में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। जवाहरलाल नेहरू उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (जेएनसीएएसआर) के वैज्ञानिकों ने सिडनी विश्वविद्यालय और भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) के सहयोग से एक ऐसा क्रिस्टलीय अर्धचालक विकसित किया है, जिसमें तापमान के मामूली अंतर से असाधारण रूप से बड़ा थर्मोइलेक्ट्रिक वोल्टेज उत्पन्न हुआ। शोधकर्ताओं के अनुसार इस सामग्री में दर्ज वोल्टेज सामान्य अकार्बनिक अर्धचालकों में देखे जाने वाले स्तर से कई सौ गुना और लगभग एक हजार गुना तक अधिक है। यह परिणाम ठोस पदार्थों में थर्मोइलेक्ट्रिक प्रभाव की अब तक मानी जाने वाली ऊपरी सीमा को ही नए सिरे से परिभाषित करता है।

यह खोज स्कैंडियम नाइट्राइड (ScN) की विशेष रूप से तैयार की गई पतली फिल्म में सामने आई है। लगभग 200 नैनोमीटर मोटी फिल्म में कमरे के तापमान के आसपास सीबेक गुणांक -124.6 मिलीवोल्ट प्रति केल्विन से अधिक दर्ज किया गया। ठोस क्रिस्टलीय पदार्थों के लिए यह मान पहले से ज्ञात अधिकतम सीमा से लगभग सौ गुना अधिक है। इतना ही नहीं, यह स्तर उन मानों के बराबर या उससे भी आगे है, जिन्हें अब तक मुख्य रूप से तरल इलेक्ट्रोलाइट, आयनिक जैल और हाइड्रोजेल जैसी प्रणालियों में देखा जाता था।
सीबेक प्रभाव करीब दो शताब्दियों से ज्ञात वह भौतिक घटना है, जिसमें दो अलग-अलग पदार्थों के बीच तापमान का अंतर विद्युत वोल्टेज पैदा करता है। जब किसी पदार्थ के एक सिरे को गर्म और दूसरे सिरे को ठंडा रखा जाता है, तो उसके भीतर मौजूद आवेश वाहक गर्म हिस्से से ठंडे हिस्से की ओर गति करने लगते हैं। इसी आवेश संचलन के कारण दोनों सिरों के बीच विद्युत विभवांतर उत्पन्न होता है। तापमान मापने वाले सेंसर से लेकर अपशिष्ट ऊष्मा को बिजली में बदलने वाले थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर तक कई तकनीकों का आधार यही प्रभाव है।
अब तक ठोस क्रिस्टलीय पदार्थों में इस प्रभाव की एक स्पष्ट सीमा मानी जाती थी। अधिकांश धातुएं प्रति केल्विन केवल कुछ दर्जन माइक्रोवोल्ट का वोल्टेज पैदा करती हैं, जबकि अच्छे अर्धचालकों में भी यह सामान्यतः कुछ सौ माइक्रोवोल्ट प्रति केल्विन से अधिक नहीं होता। इसके विपरीत तरल इलेक्ट्रोलाइट और आयनिक प्रणालियां मिलीवोल्ट प्रति केल्विन स्तर तक पहुंच सकती हैं। इसलिए यह धारणा बनी हुई थी कि इतना बड़ा थर्मोइलेक्ट्रिक प्रभाव ठोस, विशेष रूप से एकल-क्रिस्टलीय पदार्थों में हासिल करना संभव नहीं होगा।
जेएनसीएएसआर की शोध टीम ने इसी स्थापित सीमा को चुनौती देने वाला प्रयोग किया। अल्ट्राहाई-वैक्यूम मैग्नेट्रॉन स्पटरिंग तकनीक की मदद से मैग्नीशियम ऑक्साइड सब्सट्रेट पर स्कैंडियम नाइट्राइड की पतली फिल्म तैयार की गई। इसके बाद इसमें मैग्नीशियम मिलाया गया ताकि ऑक्सीजन डोपेंट के कारण स्वाभाविक रूप से मौजूद अतिरिक्त मुक्त इलेक्ट्रॉनों की भरपाई की जा सके। इस प्रक्रिया से अत्यधिक डोप्ड और अत्यधिक संतुलित अर्धचालक तैयार हुआ, जिसमें धनात्मक और ऋणात्मक आवेश वाले डोपेंट परमाणुओं का संतुलन स्थापित किया गया।
विशेष बात यह रही कि डोपिंग की प्रक्रिया के बावजूद सामग्री की क्रिस्टलीय गुणवत्ता बरकरार रही। एक्स-रे विवर्तन और परमाणु-रिजॉल्यूशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी से पुष्टि हुई कि तैयार फिल्म एकल-क्रिस्टलीय और एपिटैक्सियल बनी रही तथा उसमें कोई अवांछित द्वितीयक चरण या अवक्षेप नहीं बना। यानी वैज्ञानिकों ने बिना सामग्री को अमोर्फ या बहु-चरणीय बनाए उसके भीतर ऐसा आवेश संतुलन तैयार किया, जिसने थर्मोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया को असाधारण स्तर तक पहुंचा दिया।
शोध के दौरान वैज्ञानिकों को एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। जब स्कैंडियम नाइट्राइड की फिल्म की मोटाई कम की गई तो थर्मोइलेक्ट्रिक प्रभाव और अधिक मजबूत होता गया। इससे संकेत मिलता है कि सामग्री की मोटाई, नियंत्रित डोपिंग और आवेश क्षतिपूर्ति को एक साथ इंजीनियर करके ठोस पदार्थों में बेहद उच्च थर्मोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया हासिल की जा सकती है। शोध दल का कहना है कि इस काम की शुरुआत किसी रिकॉर्ड को तोड़ने के उद्देश्य से नहीं हुई थी। लक्ष्य यह समझना था कि अव्यवस्था और आवेश क्षतिपूर्ति स्कैंडियम नाइट्राइड में इलेक्ट्रॉनिक परिवहन को किस प्रकार बदलती है। प्रयोगों के दौरान सामने आया परिणाम अपेक्षा से कहीं अधिक बड़ा था।

इस खोज का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि वैज्ञानिकों ने इसके आधार पर एक प्रारंभिक फोटॉन सेंसर भी तैयार किया। इसके लिए एचडीएचसी स्कैंडियम नाइट्राइड फिल्म पर क्रोमियम के दो संपर्क बनाए गए। जब एक संपर्क को लेजर से प्रकाशित किया गया तो उस हिस्से में बहुत छोटा स्थानीय तापमान अंतर पैदा हुआ। इस मामूली तापमान परिवर्तन को फिल्म ने विद्युत संकेत में बदल दिया और लगभग -102.4 मिलीवोल्ट प्रति केल्विन की सीबेक प्रतिक्रिया दर्ज की गई। सेंसर की प्रतिक्रिया तेज रही और कई प्रकाश चक्रों में दोहराई जा सकी। महत्वपूर्ण रूप से प्रकाश के संपर्क के बाद सामग्री की संरचना में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक को आगे अनुकूलित किया गया तो कमरे के तापमान के आसपास एकल-फोटॉन स्तर के संकेतों का पता लगाने की क्षमता भी विकसित की जा सकती है। यही वजह है कि इस खोज को केवल थर्मोइलेक्ट्रिक सामग्री के क्षेत्र में एक नया रिकॉर्ड नहीं, बल्कि भविष्य की अत्यधिक संवेदनशील सेंसर तकनीक की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। तापमान में बेहद छोटे बदलावों का पता लगाने वाले सेंसर, कम शोर वाली थर्मल इमेजिंग, उच्च-रिजॉल्यूशन ताप-प्रवाह पहचान, बोलोमेट्रिक उपकरण और इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित सेंसरों में इसके उपयोग की संभावनाएं सामने आई हैं। इसके अलावा क्वांटम तकनीक के क्षेत्र में क्रायोजेनिक थर्मोइलेक्ट्रिक सिंगल-फोटॉन डिटेक्टर विकसित करने में भी यह सामग्री उपयोगी हो सकती है।
शोधकर्ताओं ने इस काम के आधार पर तापमान और फोटॉन पहचान से जुड़ी थर्मोइलेक्ट्रिक पतली-फिल्म सामग्री तथा सेंसर के लिए भारतीय पेटेंट आवेदन भी दाखिल किया है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस प्रभाव की तीव्र और स्पष्ट तापमान निर्भरता भविष्य में तापमान नियंत्रित सीबेक स्विच विकसित करने की संभावना भी पैदा करती है।
प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका Science में प्रकाशित यह शोध ठोस-अवस्था थर्मोइलेक्ट्रिक्स की स्थापित समझ को चुनौती देता है। अब तक जिस स्तर की थर्मोइलेक्ट्रिक प्रतिक्रिया को मुख्य रूप से तरल इलेक्ट्रोलाइट और आयनिक प्रणालियों की विशेषता माना जाता था, उसी तरह का प्रभाव एक पूरी तरह क्रिस्टलीय और एपिटैक्सियल ठोस अर्धचालक में हासिल होना इस खोज को खास बनाता है। यह उपलब्धि बताती है कि नियंत्रित अव्यवस्था और आवेश क्षतिपूर्ति को सही ढंग से इंजीनियर कर ठोस पदार्थों में ऐसी संवेदन क्षमता विकसित की जा सकती है, जो अब तक विज्ञान की कल्पना से बाहर मानी जाती थी। आने वाले समय में यही तकनीक बेहद कमजोर तापीय और प्रकाश संकेतों को पकड़ने वाले अधिक संवेदनशील, तेज और कम शोर वाले उपकरणों के विकास की नींव बन सकती है।













