चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नरोत्तम सिंह टेमार्य जब अर्द्धवार्षिकी आयु पूर्ण कर शासकीय सेवा से विदा हुए तो जिला कार्यालय का सभाकक्ष उनके सम्मान का साक्षी बना। कलेक्टर दिव्या उमेश मिश्रा ने उन्हें भावभीनी विदाई दी और सेवानिवृत्ति के अवसर पर अवकाश नगदीकरण एवं भविष्य निधि की राशि स्वयं भेंट की। प्रतीक चिन्ह से सम्मानित करते हुए उन्होंने टेमार्य के स्वस्थ, सुखद और उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
यह दृश्य इसलिए भी उल्लेखनीय था क्योंकि सरकारी व्यवस्था में किसी कर्मचारी का पद भले ही छोटा हो, लेकिन उसके काम के प्रति निष्ठा और व्यवहार से बनी प्रतिष्ठा कभी छोटी नहीं होती। नरोत्तम सिंह टेमार्य का सेवाकाल इसी बात की मिसाल रहा। वर्ष 1995 से विभिन्न शासकीय कार्यालयों में अपनी सेवाएं देने के बाद नवीन जिला बालोद के गठन के पश्चात वे जिला कार्यालय बालोद में पदस्थ हुए। वर्ष 2014 से वे कलेक्टर के निज पदस्थापना शाखा में कार्यरत रहे और जिले में पदस्थ अलग-अलग कलेक्टरों के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए सेवानिवृत्त हुए।
करीब तीन दशक की सरकारी सेवा में उन्होंने पद से अधिक अपने आचरण और कर्तव्यनिष्ठा से पहचान बनाई। सरलता, सहजता और अनुशासन के साथ काम करने वाले टेमार्य के प्रति कार्यालय में जो आत्मीयता बनी, वही उनकी विदाई के दौरान भी दिखाई दी। यह महज एक कर्मचारी की सेवानिवृत्ति नहीं थी, बल्कि उस सेवा-भाव का सम्मान था, जो वर्षों तक बिना किसी दिखावे के सरकारी व्यवस्था को अपनी भूमिका से मजबूती देता रहा।

कलेक्टर का संदेश—पद नहीं, कर्तव्य मायने रखता है
कलेक्टर दिव्या उमेश मिश्रा ने टेमार्य के व्यक्तित्व और कार्यशैली की सराहना करते हुए कहा कि शासकीय सेवा में ईमानदारी, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के साथ लंबे समय तक काम करना अपने आप में सराहनीय उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद भी टेमार्य स्वस्थ और सुखमय जीवन बिताएं, यही उनकी शुभकामना है।
कलेक्टर का यह सम्मान केवल एक कर्मचारी के प्रति व्यक्तिगत सद्भावना भर नहीं रहा, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में समभाव और समानता की उस भावना को भी रेखांकित करता है, जिसमें कर्मचारी की अहमियत उसके पद से नहीं, उसके योगदान से तय होती है। जिला प्रशासन की मुखिया द्वारा एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को उसी गरिमा के साथ विदाई देना, जिस गरिमा की अपेक्षा किसी बड़े अधिकारी के लिए की जाती है, कार्यस्थल के मानवीय पक्ष को सामने लाता है।
सेवानिवृत्ति के दिन ही मिला हक
समारोह का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि कलेक्टर ने सेवानिवृत्ति के अवसर पर अवकाश नगदीकरण और भविष्य निधि की राशि प्रदान करने की पहल की। उन्होंने वित्त स्थापना शाखा के प्रभारी अधिकारी और वित्त शाखा के कर्मचारियों की सराहना करते हुए कहा कि सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारी-कर्मचारियों को उनके देय स्वत्वों का समय पर भुगतान सुनिश्चित करना कार्यालय की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
यानी विदाई केवल फूल-माला और शुभकामनाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि जिस व्यवस्था की सेवा कर्मचारी ने वर्षों तक की, उसी व्यवस्था ने उसके अधिकारों को भी समय पर सम्मान के साथ लौटाया।
समारोह में अपर कलेक्टर चन्द्रकांत कौशिक, अजय किशोर लकड़ा सहित जिला कार्यालय के प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे। सभी ने टेमार्य के लंबे सेवाकाल की सराहना करते हुए उनके भावी जीवन के लिए शुभकामनाएं दीं।

दफ्तर से गांव तक, सम्मान की वही गर्माहट
जिला कार्यालय में सम्मान समारोह के बाद अधिकारी-कर्मचारियों ने नरोत्तम सिंह टेमार्य को सम्मानपूर्वक उनके गृहग्राम सहगांव पहुंचाया। वहां पहुंचते ही सरकारी दफ्तर का औपचारिक वातावरण आत्मीयता में बदल गया। सरपंच भुषण लाल देवागन, ग्राम पटेल, ग्रामीणों और परिवारजनों ने उनका आत्मीय स्वागत किया।
जिस व्यक्ति ने वर्षों तक सरकारी दफ्तर की जिम्मेदारियों को निभाया था, उसके अपने गांव ने भी उसकी सेवा को उसी अपनत्व से स्वीकार किया। ग्रामवासियों और परिजनों ने उनके सेवाकाल की सराहना करते हुए सेवानिवृत्ति के बाद स्वस्थ और सुखमय जीवन की शुभकामनाएं दीं।
नरोत्तम सिंह टेमार्य की विदाई इसलिए याद रखने लायक है कि यह कहानी किसी बड़े पद, बड़े काफिले या बड़े प्रशासनिक फैसले की नहीं है। यह कहानी उस छोटे से पद पर बैठे उस कर्मचारी की है, जिसने अपने व्यवहार और कर्म से अपने लिए बड़ा सम्मान अर्जित किया।
और यह उस प्रशासनिक सोच की भी तस्वीर है, जहां जिले की मुखिया के लिए कर्मचारी का पद उसकी गरिमा का पैमाना नहीं, बल्कि उसकी निष्ठा, योगदान और इंसानी पहचान ज्यादा मायने रखती है। और शायद यही किसी कर्मचारी के लिए सबसे बड़ी सेवानिवृत्ति होती है जहां—सरकारी सेवा से विदा होना, लेकिन लोगों की स्मृतियों और सम्मान में बने रहना।













