धर्मसभा में बोले जैन संत—मनोरंजन नहीं, आत्मरंजन से सार्थक होगा जीवन; भय छोड़कर अभय बनने और आत्मा की रक्षा का लिया संकल्प
बालोद। रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के संकल्प का पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और जीवन के मूल्यों को समझने का अवसर भी है। इस पर्व पर प्रत्येक व्यक्ति को संकल्प लेना चाहिए कि वह किसी का विश्वास नहीं तोड़ेगा, दिया हुआ वचन नहीं तोड़ेगा और किसी का दिल नहीं दुखाएगा। टूटने वाली चीजों की आवाज भले ही सुनाई न दे, लेकिन उनका दर्द बेहद गहरा होता है। यह बात चातुर्मास के दौरान आयोजित धर्मसभा में जैन संत अक्षय मुनि ने कही।
उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन पर्व को मनोरंजन के साथ आत्मरंजन के रूप में भी मनाया जा सकता है। हिंदुस्तान में त्योहारों की कमी नहीं है। त्योहार मनुष्य के जीवन में उमंग और जुड़ाव लेकर आते हैं, क्योंकि इनके अभाव में व्यक्ति अकेलापन महसूस करने लगता है। लेकिन केवल बाहरी उत्सव से जीवन सार्थक नहीं होता, बल्कि व्यक्ति को अपने भीतर प्रवेश करना होगा। आत्मा के भीतर ही परमात्मा का वास है।
बाहरी सुख नहीं, भीतर के आनंद की तलाश जरूरी
अक्षय मुनि ने कहा कि आज मनुष्य बाहर के रस में जीवन जी रहा है, जबकि अपने भीतर जीवन जीने का रस पैदा नहीं कर पाया है। प्रत्येक तिथि पर कोई न कोई पर्व आता है, लेकिन इसके बावजूद व्यक्ति स्वयं से ही परेशान और असंतुष्ट दिखाई देता है। जीवन को समझने के लिए बाहरी आकर्षण से आगे बढ़कर स्वयं के भीतर झांकना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार व्यक्ति पहले नमक का सेवन करता है, फिर धीरे-धीरे उसकी आदत बढ़ती जाती है और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां सामने आती हैं, उसी तरह जीवन में किसी भी चीज का अत्यधिक मोह आगे चलकर नशे का रूप ले सकता है। धन कमाने वाले व्यक्ति पर धन का नशा चढ़ सकता है और सामाजिक जीवन जीने वाले व्यक्ति को पद-प्रतिष्ठा का नशा घेर सकता है। मनुष्य को इन मोहों और अहंकार से स्वयं को बचाना होगा।
कुदरत के सामने मनुष्य को समझना होगा अपनी सीमा
नेपाल की त्रासदी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कुदरत जब अपना स्वरूप दिखाती है तो परिस्थितियां कितनी भयावह हो सकती हैं, इसका उदाहरण सामने है। मनुष्य को प्रकृति के सामने अपनी सीमाओं को समझना चाहिए और जीवन के प्रति जागरूक होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक प्राणी के लिए कुदरत ने भोजन की व्यवस्था की है, लेकिन भोजन केवल घोंसले में रखकर नहीं दिया गया। पक्षी को भोजन की तलाश में घोंसले से बाहर निकलकर उड़ना पड़ता है। इसी तरह मनुष्य को भी जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रयास करना होगा। केवल परिस्थितियों के भरोसे बैठने से जीवन की सार्थकता हासिल नहीं की जा सकती।
महावीर का जीवन अभय बनने की प्रेरणा देता है
अक्षय मुनि ने कहा कि भगवान महावीर अभय थे। उन्होंने भयंकर जंगलों में जाकर तपस्या की, लेकिन भय को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। आज मनुष्य बिना परिस्थिति आए ही भयभीत है। डरी हुई कौम कभी आगे नहीं बढ़ सकती। जीवन में तपस्या, आत्मविश्वास और निर्भयता जरूरी है।
उन्होंने कहा कि मानव जीवन 84 लाख योनियों के चक्र के बाद मिला अनमोल अवसर है। इसे व्यर्थ के मोह, नशे और बाहरी आकर्षण में गंवाना उचित नहीं है। व्यक्ति को यह समझना होगा कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है।
ज्ञानी की संगति जीवन में शांति और सुगंध भरती है
धर्मसभा में उन्होंने कहा कि विद्वान जब बोलता है तो उसकी विद्वता दिखाई देती है, लेकिन ज्ञानी के पास बैठने से शांति की अनुभूति होती है। किताबी ज्ञान अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन जीवन को सही दिशा देने वाली अनुभूति और आत्मज्ञान का महत्व अलग है।
उन्होंने प्रेम, करुणा और मैत्री का झरना बहाने का आह्वान करते हुए कहा कि मनुष्य को लाभ-हानि और मुहूर्त जैसे बाहरी चक्रों में उलझकर जीवन को सीमित नहीं करना चाहिए। जो साधु इन मोह-माया से ऊपर उठता है, उसकी संगति से जीवन में सकारात्मकता और शांति की सुगंध आती है।
मोबाइल और कंप्यूटर के मोह से बच्चों को बचाने की जरूरत
अक्षय मुनि ने कहा कि आज बचपन मोबाइल और कंप्यूटर में उलझता जा रहा है। बच्चों को केवल दिमागी ज्ञान नहीं, बल्कि संस्कार देना भी जरूरी है। यदि बचपन ही बाहरी साधनों के मोह में फंस गया तो जीवन का संतुलन बिगड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि रक्षाबंधन के अवसर पर बहनों और परिवारों को केवल बाहरी रक्षा के अर्थ तक सीमित नहीं रहना चाहिए। वास्तविक रक्षा आत्मा की रक्षा है। सुखी होने का रास्ता आध्यात्म के अलावा कहीं और नहीं है।
उन्होंने बहनों से अठाई तपस्या के धागे के साथ स्वयं को जोड़ने और धर्म-आराधना के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया।
अब्दुल कलाम का उदाहरण देते हुए हीन भावना छोड़ने की सीख
अक्षय मुनि ने पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रतिभा और संघर्ष के बल पर व्यक्ति जीवन में किसी भी ऊंचाई तक पहुंच सकता है। उन्होंने वैज्ञानिक के रूप में देश को नई दिशा दी और बाद में राष्ट्रपति पद तक पहुंचे। इसलिए किसी व्यक्ति को अपने भीतर हीन भावना नहीं लानी चाहिए। आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच से ही जीवन सार्थक बनता है।

31 उपवास की तपस्या पूर्ण करने पर शर्मिला बाफना का अभिनंदन
चातुर्मास के दौरान बालोद में निरंतर धर्म-आराधना, त्याग और तपस्या का वातावरण बना हुआ है। अक्षय मुनि की प्रेरणा से धर्मप्रेमी भाई-बहन लगातार तपस्या से जुड़ रहे हैं।
इसी क्रम में शर्मिला बाफना ने 31 उपवास की तपस्या पूर्ण की। वहीं प्रिया श्रीश्रीमाल और स्नेहल लोढ़ा ने 29 उपवास, नमिता नाहटा ने 26, ईशा तातेड ने 25, कुसुम सौरभ नाहटा ने 13, सौरभ चोपड़ा और परी नाहटा ने 8 उपवास की तपस्या पूर्ण की। इसके साथ ही अन्य साधकों ने गुप्त उपवास की तपस्या का प्रत्याख्यान संकल्प भी लिया।
तपस्वियों की साधना की अनुमोदना करते हुए ममता चोपड़ा ने अपने भाव व्यक्त किए। धर्मसभा का संचालन कमल पारख ने किया।
रक्षाबंधन के तीन सूत्र
धर्मसभा में अक्षय मुनि का संदेश स्पष्ट रहा कि रक्षाबंधन केवल कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने का पर्व नहीं, बल्कि जीवन में तीन संकल्प उतारने का अवसर है—किसी का विश्वास मत तोड़ो।दिया हुआ वचन मत तोड़ो। किसी का दिल मत तोड़ो। इन तीन सूत्रों को जीवन में उतार लिया जाए तो रक्षाबंधन का पर्व केवल एक दिन का उत्सव न रहकर पूरे जीवन को दिशा देने वाला आध्यात्मिक संकल्प बन सकता है।













