
गुरुर में बच्चों संग विधायक ने मनाया पर्व
गुरुर में विधायक ने अपने घर पर बच्चों के साथ पोला मनाया। उन्होंने पारंपरिक रूप से बैल की पूजा की और बच्चों के साथ पर्व की खुशियां साझा कीं। बच्चों ने मिट्टी के बैलों और पारंपरिक खिलौनों के साथ उत्साहपूर्वक पर्व मनाया।
बैल नहीं, फिर भी नहीं टूटी परंपरा
जिन घरों में वास्तविक बैल नहीं हैं, वहां मिट्टी और लकड़ी के बैलों ने परंपरा को जीवंत रखा। दोपहर में बैल, जांता, चुकिया, सुपली और कड़ाही सहित मिट्टी से बने खिलौनों व बर्तनों को सजाकर पूजा की गई। महिलाओं ने सुबह से पकवान तैयार किए। पूजा के बाद बालिकाओं ने मिट्टी के बर्तनों से प्रतीकात्मक रसोई सजाई, जबकि बच्चे नांदिया बैल लेकर गलियों में दौड़ते नजर आए।

लोकसंस्कृति से जुड़ा कृषि पर्व
पोला केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि खेती और पशुधन के रिश्ते को सम्मान देने की ग्रामीण परंपरा है। कृषि के बदलते तौर-तरीकों के बीच भी बैलों के प्रति सम्मान की यह परंपरा गांवों में कायम है। पर्व के जरिए नई पीढ़ी भी मिट्टी के खिलौनों, पारंपरिक खेलों और रीति-रिवाजों से जुड़ती दिखाई दी।
पोलासुर से जुड़ी मान्यता
पोला पर्व को लेकर मान्यता है कि बाल रूप में भगवान श्रीकृष्ण का वध करने कंस ने पोलासुर नामक असुर को भेजा था, जिसका श्रीकृष्ण ने वध कर दिया। कहा जाता है कि यह घटना भादो अमावस्या के दिन हुई थी। एक अन्य मान्यता के अनुसार खेती के प्रमुख कार्य पूरे होने के बाद इस दिन अन्नमाता और कृषि से जुड़े संसाधनों को विश्राम दिया जाता है। यही वजह है कि पोला आज भी किसान जीवन और ग्रामीण संस्कृति का अहम पर्व बना हुआ है।













