सरकार ने जारी किया विस्तृत तथ्यपत्र, कहा— एथेनॉल मिश्रण सुरक्षित, वैज्ञानिक और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम
नई दिल्ली। देशभर में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई-20) को लेकर सोशल मीडिया, विभिन्न सार्वजनिक मंचों और न्यायालय में चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने पहली बार विस्तार से अपना आधिकारिक पक्ष रखा है। प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) द्वारा जारी विस्तृत बैकग्राउंडर में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम (ईबीपी) की उपलब्धियों, वैज्ञानिक परीक्षणों, ऊर्जा सुरक्षा में इसकी भूमिका तथा इससे जुड़े विभिन्न दावों और भ्रांतियों पर तथ्यात्मक जानकारी साझा की गई है।
सरकार का कहना है कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम केवल पेट्रोल में वैकल्पिक ईंधन मिलाने की योजना नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा आत्मनिर्भरता, विदेशी मुद्रा बचत, किसानों की आय बढ़ाने, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने तथा पर्यावरण संरक्षण की दीर्घकालिक राष्ट्रीय रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य समय से पहले हासिल
सरकार के अनुसार भारत ने एथेनॉल मिश्रण के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल करते हुए वर्ष 2025-26 में 20 प्रतिशत मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित समय से पांच वर्ष पहले पूरा कर लिया है।
मुख्य उपलब्धियां
- वर्ष 2013-14 में एथेनॉल मिश्रण 1.5 प्रतिशत से भी कम था।
- वर्ष 2025-26 में यह बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गया।
- एथेनॉल खरीद 38 करोड़ लीटर से बढ़कर 1,200 करोड़ लीटर (अनुमानित) से अधिक हो गई।
- उत्पादन क्षमता 421 करोड़ लीटर से बढ़कर लगभग 2,000 करोड़ लीटर तक पहुंच गई।
सरकार का मानना है कि यह उपलब्धि देश की ऊर्जा नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत है।
ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को मिला बड़ा सहारा
पीआईबी के अनुसार मई 2026 तक एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से देश को कई प्रत्यक्ष आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ मिले हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार—
- ₹1.90 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा की बचत।
- 310 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल के आयात का प्रतिस्थापन।
- लगभग 930 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी।
- किसानों को ₹1.60 लाख करोड़ से अधिक की अतिरिक्त आय।
सरकार ने बताया कि भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 88.5 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में देश में उत्पादित गन्ना, मक्का और अधिशेष चावल से तैयार एथेनॉल आयात निर्भरता कम करने का प्रभावी विकल्प बनकर उभरा है।
एथेनॉल को लेकर फैली भ्रांतियों पर सरकार का जवाब
देशभर में ई-20 को लेकर कई प्रकार की चर्चाएं और दावे सामने आए हैं। इन्हीं को लेकर पीआईबी ने क्रमवार स्पष्टीकरण जारी किया है।
क्या ई-20 से माइलेज 30 प्रतिशत कम हो जाता है?
सरकार ने इस दावे को भ्रामक बताया है। उसके अनुसार 30 प्रतिशत का आंकड़ा केवल एथेनॉल की ऊष्मीय क्षमता से संबंधित है। वास्तविक परिस्थितियों में माइलेज पर प्रभाव सीमित रहता है। वाहन की स्थिति, टायर प्रेशर, ड्राइविंग शैली और रखरखाव जैसे कारकों का प्रभाव कहीं अधिक होता है।

क्या ई-20 से इंजन खराब होता है?
सरकार के अनुसार ई-20 लागू होने के बाद इंजन खराब होने का कोई व्यापक पैटर्न सामने नहीं आया है। एसआईएएम, एआरएआई तथा इंडियन ऑयल सहित विभिन्न संस्थाओं द्वारा व्यापक परीक्षण के बाद ही इसे लागू किया गया।
क्या बीमा और वारंटी समाप्त हो जाती है?
सरकार ने स्पष्ट किया कि ई-20 के उपयोग से वाहन की वारंटी या बीमा दावों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। वाहन निर्माता कंपनियों ने भी इसकी पुष्टि की है।
क्या सरकार मूल्य का अंतर अपने पास रख रही है?
पीआईबी के अनुसार वर्ष 2020-21 में एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता था, लेकिन वर्तमान में इसकी खरीद लागत अधिक है। इसके बावजूद ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने जैसे दीर्घकालिक लाभों को देखते हुए कार्यक्रम जारी रखा गया है।
क्या सरकार ने न्यायालय में ई-20 को केवल ‘प्रयोग’ बताया?
सरकार ने इस दावे को तथ्यहीन बताया है। उसके अनुसार न्यायालय में विचाराधीन मामला एथेनॉल खरीद अनुबंधों से संबंधित था, न कि ई-20 की उपयोगिता से। 30 जून 2026 को महान्यायवादी कार्यालय ने भी इस संबंध में स्थिति स्पष्ट कर दी थी।
क्या पेट्रोल में सीधे गन्ने का रस मिलाया जाता है?
सरकार ने सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को भ्रामक बताया है। उसके अनुसार एथेनॉल औद्योगिक किण्वन और आसवन प्रक्रिया से तैयार किया जाता है तथा निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरने के बाद ही पेट्रोल में मिश्रित किया जाता है।
क्या एक लीटर एथेनॉल के लिए 10 हजार लीटर पानी खर्च होता है?
सरकार ने इस दावे को भी गलत बताया है। पीआईबी के अनुसार एथेनॉल संयंत्र में प्रति लीटर उत्पादन के लिए केवल 3 से 5 लीटर प्रसंस्कृत जल का उपयोग होता है। आधुनिक डिस्टिलरियां जीरो लिक्विड डिस्चार्ज प्रणाली पर संचालित होती हैं।
क्या ई-20 से चींटियां और मधुमक्खियां आकर्षित होती हैं?
सरकार के अनुसार ईंधन ग्रेड एथेनॉल में कोई शर्करा नहीं होती। इसमें डिनैचुरेंट मिलाए जाते हैं, इसलिए इस प्रकार के दावे वैज्ञानिक आधार से परे हैं।
क्या एथेनॉल पानी सोखकर फ्यूल टैंक खराब कर देता है?
पीआईबी के अनुसार आधुनिक वाहनों के फ्यूल टैंक इस प्रकार डिजाइन किए जाते हैं कि उनमें पानी प्रवेश न कर सके। इसलिए ई-20 से टैंक खराब होने का दावा तथ्यात्मक नहीं है।
ऑटोमोबाइल कंपनियों ने भी जताया भरोसा
सरकार ने अपने तथ्यपत्र में प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों के अनुभव भी साझा किए हैं।
टोयोटा किर्लोस्कर मोटर ने कहा कि ई-20 एक सिद्ध, सुरक्षित और व्यापक परीक्षणों के बाद अपनाया गया ईंधन है।
मारुति सुज़ुकी के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में सर्विस किए गए 2.84 करोड़ वाहनों में से 1.5 करोड़ से अधिक वाहन ई-20 प्रमाणित नहीं थे, फिर भी ईंधन से संबंधित किसी अतिरिक्त क्षति का मामला सामने नहीं आया। कंपनी के अनुसार यदि कोई वाहन 20 किलोमीटर प्रति लीटर माइलेज देता है तो औसतन केवल लगभग 0.6 किलोमीटर प्रति लीटर का ही अंतर देखने को मिलता है।
हीरो मोटोकॉर्प ने भी अपने सर्विस रिकॉर्ड के आधार पर ई-20 को सुरक्षित बताया, जबकि इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड की पूर्व अध्यक्ष वर्तिका शुक्ला ने इसे वैज्ञानिक परीक्षणों और वैश्विक मानकों पर आधारित कार्यक्रम बताया।
दुनिया के कई देशों में पहले से लागू है एथेनॉल मिश्रण
पीआईबी के अनुसार भारत अकेला देश नहीं है जिसने एथेनॉल मिश्रण को अपनाया है।
वैश्विक स्थिति
- अमेरिका में ई-10 मानक ईंधन है तथा ई-15 का विस्तार किया जा रहा है।
- ब्राजील में ई-27 अनिवार्य है और इसे लगभग 35 प्रतिशत तक बढ़ाने की तैयारी चल रही है।
- जापान चरणबद्ध तरीके से ई-10 लागू कर रहा है।
- कनाडा, थाईलैंड तथा कई यूरोपीय देशों ने भी एथेनॉल मिश्रण को अपनी स्वच्छ ऊर्जा नीति का हिस्सा बनाया है।
न्यायालयी बहस के बीच सरकार का आधिकारिक पक्ष
हाल के दिनों में ई-20 को लेकर सोशल मीडिया पर माइलेज, इंजन, वारंटी, पानी की खपत और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर अनेक दावे किए जा रहे हैं। इस विषय से जुड़े कुछ मामले न्यायालय में भी विचाराधीन हैं। ऐसे समय में केंद्र सरकार द्वारा जारी यह विस्तृत तथ्यपत्र एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम पर सरकार का आधिकारिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण सामने रखने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जा रहा है।
सरकार का कहना है कि वैज्ञानिक परीक्षणों, उद्योग जगत के अनुभवों और वैश्विक मानकों के आधार पर तैयार किया गया यह कार्यक्रम आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करेगा, किसानों को अतिरिक्त आय उपलब्ध कराएगा तथा स्वच्छ और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।




















