पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी डॉ. तीजन बाई का निधन, छत्तीसगढ़ सहित देशभर में शोक की लहर
पद्म विभूषण से सम्मानित लोककला की महान हस्ती ने AIIMS रायपुर में ली अंतिम सांस, लंबे समय से थीं अस्वस्थ

रायपुर। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली सुप्रसिद्ध पंडवानी गायिका डॉ. तीजन बाई का निधन हो गया। उन्होंने रायपुर स्थित एम्स अस्पताल में उपचार के दौरान रात 3:15 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश के कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। वे लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं और 27 मई से एम्स रायपुर के क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती थीं।
डॉ. तीजन बाई को फेफड़ों में पानी भरने, निमोनिया तथा लो ब्लड प्रेशर की शिकायत के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। पिछले कुछ वर्षों से उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा था और वे अधिकतर समय बिस्तर पर ही थीं। उपचार के दौरान चिकित्सकों के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा को विश्व मंच तक पहुंचाया
दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी डॉ. तीजन बाई ने बेहद साधारण परिवार से निकलकर पंडवानी गायन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनके पिता का नाम हुकुमचंद परधा तथा माता का नाम सुखवाती बाई था। वे छत्तीसगढ़ की पारधी अनुसूचित जनजाति से संबंध रखती थीं।
बचपन में अपने नाना ब्रजलाल पारधी से महाभारत की कथाएं सुनते-सुनते उन्होंने पंडवानी की बारीकियां आत्मसात कर लीं। बाद में उन्हें उमेद सिंह देशमुख से अनौपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति देकर अपनी अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया।

पुरुष प्रधान परंपरा को तोड़कर रचा नया इतिहास
उस समय महिलाओं द्वारा बैठकर प्रस्तुत की जाने वाली वेदमती शैली प्रचलित थी, लेकिन डॉ. तीजन बाई ने परंपराओं को चुनौती देते हुए पुरुषों के वर्चस्व वाली कापालिक शैली को अपनाया। खड़े होकर दमदार अभिनय, ओजपूर्ण आवाज और जीवंत अभिव्यक्ति के साथ उन्होंने पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
उनकी असाधारण प्रतिभा को प्रख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, मॉरीशस सहित 17 से अधिक देशों में उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का परचम लहराया।

सम्मानों से भरा रहा गौरवशाली सफर
लोककला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। प्रमुख सम्मान इस प्रकार हैं—
- 1988 – पद्मश्री
- 1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
- 2003 – पद्म भूषण
- 2018 – प्रतिष्ठित जापानी ‘फुकुओका पुरस्कार’
- 2019 – पद्म विभूषण
- बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट. (मानद उपाधि)
जीवन के अंतिम वर्षों में बीमारी से लंबी जंग
डॉ. तीजन बाई के जीवन का अंतिम दौर काफी कठिन रहा। बड़े बेटे के निधन के बाद वे गहरे सदमे में चली गई थीं। बताया जाता है कि इसी दौरान उन्होंने रक्तचाप की दवाएं लेना बंद कर दिया था, जिसके बाद वर्ष 2024 में उन्हें लकवा (पैरालिसिस) का अटैक आया। तब से उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता गया। हाल ही में निमोनिया, फेफड़ों में पानी भरने और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत के बाद उन्हें एम्स रायपुर में भर्ती कराया गया था, जहां उपचार के दौरान उनका निधन हो गया।
एक युग का अंत
डॉ. तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं थीं, बल्कि वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान की सशक्त प्रतीक थीं। उन्होंने अपनी आवाज, अभिनय और अद्वितीय शैली से पंडवानी को विश्व पटल पर स्थापित किया। उनका निधन भारतीय लोककला जगत की ऐसी क्षति है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। उनकी कला, संघर्ष और उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी।




















