
दरअसल महाविद्यालय में 9 मई 2026 को एक सूचना जारी कर सभी विभागाध्यक्षों को निर्देशित किया गया कि वे अपने विभागों से संबंधित समस्त शैक्षणिक एवं अशैक्षणिक कार्य 15 मई 2026 तक अधीनस्थ अतिथि व्याख्याताओं से पूर्ण कराकर आवश्यक दस्तावेज जमा करा लें। इस आदेश के बाद अतिथि व्याख्याताओं के बीच असमंजस की स्थिति बन गई, क्योंकि आदेश में कार्यमुक्ति के बाद पुनः जॉइनिंग तिथि का कोई उल्लेख नहीं किया गया।
अतिथि व्याख्याताओं ने अपने ज्ञापन में कहा है कि पूर्व में सेमेस्टर ब्रेक अवधि के दौरान जारी आदेशों में कार्यमुक्ति अवधि के साथ पुनः जॉइनिंग तिथि स्पष्ट रूप से अंकित रहती थी, जिससे सेवाओं की निरंतरता बनी रहती थी। लेकिन इस बार केवल कार्यमुक्ति की बात कही गई है। व्याख्याताओं का कहना है कि पहले ही 16 दिनों के ब्रेक के कारण कक्षाएं विलंब से प्रारंभ हुई हैं और कई विषयों का पाठ्यक्रम अभी अधूरा है।

ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि 23 मई से प्रयोगात्मक परीक्षाएं प्रस्तावित हैं तथा इसके बाद सेमेस्टर परीक्षाएं भी शुरू होने वाली हैं। ऐसे में यदि अतिथि व्याख्याताओं को कार्य से अलग किया जाता है तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और परीक्षा तैयारी पर पड़ेगा। अतिथि व्याख्याताओं ने मांग की है कि कार्यमुक्ति आदेश में जॉइनिंग तिथि स्पष्ट रूप से दर्ज की जाए, ताकि भविष्य में शैक्षणिक कार्य, परीक्षा संबंधी दायित्व और सेवा निरंतरता को लेकर किसी प्रकार की अस्पष्टता न रहे।
विभागाध्यक्षों ने भी जताई थी आपत्ति
पूरे मामले को लेकर अतिथि व्याख्याताओं ने बताया कि प्रभारी प्राचार्य द्वारा आनन-फानन में विभागाध्यक्षों की बैठक बुलाकर अतिथि व्याख्याताओं को हटाने के निर्देश दिए गए थे। बैठक में अधिकांश विभागाध्यक्षों ने यह कहते हुए आपत्ति दर्ज कराई थी कि अभी तक कई विषयों का सिलेबस पूरा नहीं हुआ है और इस निर्णय से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होगी। बावजूद इसके 15 मई तक अतिथि व्याख्याताओं से कार्य पूर्ण कराने संबंधी आदेश जारी कर दिया गया।
संयुक्त संचालक बोलीं– “मामले को दिखवाती हूं”
इस पूरे मामले को लेकर दुर्ग विश्वविद्यालय की संयुक्त संचालक अनुपमा अस्थाना से चर्चा की गई। उन्होंने कहा कि अतिथि व्याख्याताओं की नियुक्ति अधिकतम 11 माह के लिए होती है और यदि कॉलेज की पढ़ाई पूर्ण हो जाती है तो उन्हें पूर्व में कार्यमुक्त किया जा सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि बालोद लीड कॉलेज का जो मामला सामने आया है, उसे वे सोमवार को दिखवाएंगी।
अनुपमा अस्थाना ने यह भी स्पष्ट किया कि बालोद लीड कॉलेज के प्रभारी प्राचार्य जे. के. खलखो हैं, जिनसे फिलहाल संपर्क नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि यदि किसी अन्य अधिकारी को सिर्फ प्रभार सौंपा गया है तो उसका दायित्व केवल कार्यालयीन व्यवस्था संभालना हो सकता है, जबकि अतिथि व्याख्याताओं को हटाने जैसी प्रशासनिक कार्रवाई उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर मानी जाएगी।
प्रभारी प्राचार्य मानकर बोले– “लिखित आदेश मिलेगा तो वापस रख लेंगे”
मामले पर वर्तमान में कॉलेज की जिम्मेदारी संभाल रहे एच. एल. मानकर ने कहा कि प्रभारी प्राचार्य जे. के. खलखो छुट्टी पर जाने से पहले उन्हें प्रभार सौंपकर गए थे। उनके अनुसार खलखो ने 3-4 लोगों को हटाने की बात कही थी, जिसके निर्देश पर ही अतिथि व्याख्याताओं को कार्यमुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की गई।
जब उनसे संयुक्त संचालक अनुपमा अस्थाना के बयान के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि “यदि मैडम लिखित में आदेश देंगी तो निश्चित रूप से मैं उन्हें वापस रख लूंगा।”
“सिर्फ बालोद लीड कॉलेज में ही जारी हुआ ऐसा आदेश”
अतिथि व्याख्याताओं का कहना है कि जिले के अन्य किसी भी महाविद्यालय में इस प्रकार का एकतरफा आदेश जारी नहीं किया गया है। उनका आरोप है कि बालोद लीड कॉलेज का वर्तमान प्रबंधन तानाशाही रवैया अपनाते हुए निर्णय ले रहा है। व्याख्याताओं का कहना है कि जब पाठ्यक्रम अधूरा है और परीक्षाएं निकट हैं, तब शिक्षकों को हटाने का निर्णय छात्रों के हित में नहीं है।
बहरहाल, जिले के सबसे बड़े महाविद्यालय और लीड कॉलेज में सामने आए इस पूरे घटनाक्रम ने कई प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर प्रभारी प्राचार्य अवकाश पर हैं, वहीं दूसरी ओर उनके स्थान पर व्यवस्था संभाल रहे अधिकारी द्वारा जारी आदेश पर अब अधिकार क्षेत्र को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। अब सभी की नजरें दुर्ग विश्वविद्यालय प्रशासन की आगामी कार्रवाई और दिशा-निर्देशों पर टिकी हुई हैं।




















